कानपुर। शनिवार को पुलिस कमिश्नरेट में वह तस्वीर सामने आई जिसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया। एक तरफ वर्दी में देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले भारत तिब्बत पुलिस सीमा बल(आईटीबीपी )के दर्जनों जवान थे, दूसरी तरफ वही सरकारी तंत्र, जिस पर न्याय देने की जिम्मेदारी है। लेकिन जब एक फौजी की मां का हाथ कट जाए, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग फाइलों में उलझा रहे, तब गुस्सा सड़कों पर उतरता ही है।
कानपुर पुलिस कमिश्नरेट शनिवार सुबह अचानक छावनी में तब्दील हो गया, जब आईटीबीपी के करीब 100 हथियारबंद जवान कमांडेंट के नेतृत्व में कमिश्नर कार्यालय पहुंच गए। जवानों ने पूरे परिसर को घेर लिया। पुलिस अफसरों में हड़कंप मच गया। 15 से ज्यादा गाड़ियां और ट्रक कमिश्नरेट परिसर में खड़े रहे। मामला इतना गंभीर हो गया कि सीएमओ कार्यालय तक फोर्स पहुंच गई और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को जवाब देने के लिए तलब किया गया।
पूरा विवाद आईटीबीपी जवान विकास सिंह की मां निर्मला देवी के कटे हाथ को लेकर है। आरोप है कि कानपुर के कृष्णा हॉस्पिटल में इलाज के दौरान डॉक्टरों की घोर लापरवाही से संक्रमण फैला और आखिरकार महिला का हाथ काटना पड़ा। जवान का कहना है कि 13 मई को सांस की दिक्कत पर मां को भर्ती कराया गया था, लेकिन कुछ ही घंटों में हाथ सूजने लगा। डॉक्टरों ने मामले को हल्के में लिया। जब स्थिति बिगड़ी तो दूसरे अस्पताल रेफर किया गया, जहां संक्रमण इतना बढ़ चुका था कि 17 मई को हाथ काटना पड़ा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक फौजी को अपनी मां का कटा हाथ लेकर पुलिस कमिश्नर दफ्तर क्यों पहुंचना पड़ा? क्या उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि न्याय के लिए इंसान को अपनी मां के शरीर का अंग सबूत बनाकर घूमना पड़े?
जवान का आरोप है कि रेलबाजार पुलिस से लेकर एसीपी कार्यालय तक उसने लगातार गुहार लगाई, लेकिन कार्रवाई की जगह उसे सिर्फ आश्वासन मिला। आरोप यह भी है कि स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में डॉक्टरों को बचाने की कोशिश की गई। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने भी सीएमओ की रिपोर्ट पर नाराजगी जताते हुए साफ कहा कि “संभावनाओं” नहीं, स्पष्ट दोष तय कर रिपोर्ट दी जाए।
शनिवार को जब आईटीबीपी के जवान कमिश्नरेट पहुंचे तो यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ सीधा विद्रोह था, जिस पर आम आदमी का भरोसा लगातार टूट रहा है। देश की सुरक्षा में तैनात जवान अगर अपनी मां के लिए न्याय न दिला पाए, तो आम नागरिक की स्थिति क्या होगी यह सवाल अब पूरे प्रदेश के सामने खड़ा है।
कानपुर की यह घटना सिर्फ मेडिकल लापरवाही का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह खाकी, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा तमाचा बन चुकी है। कमिश्नरेट के बाहर घंटों तनाव बना रहा और पूरे घटनाक्रम ने योगी सरकार की कानून व्यवस्था और स्वास्थ्य तंत्र दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया।


