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Friday, May 22, 2026

बंदूक की नली पर खड़ा होता जंगलराज

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शरद कटियार

उत्तर प्रदेश में बढ़ता गन कल्चर अब केवल सुरक्षा, परंपरा या शौक का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सत्ता प्रदर्शन, दबंगई, राजनीतिक संरक्षण और भय पैदा करने का सबसे बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की हालिया सख्ती ने उस खतरनाक सच्चाई को उजागर कर दिया है, जो लंबे समय से सत्ता और सिस्टम की परछाइयों में पल रही थी। अदालत में पेश सरकारी आंकड़ों ने यह साबित कर दिया कि प्रदेश में हथियार अब सुरक्षा से ज्यादा प्रभाव और वर्चस्व का प्रतीक बन चुके हैं।

प्रदेश में 10 लाख से अधिक शस्त्र लाइसेंसधारियों के बीच 6 हजार से ज्यादा ऐसे लोगों का होना, जिन पर दो या उससे अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति है। यह आंकड़ा केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं दिखाता, बल्कि उस राजनीतिक और नौकरशाही तंत्र की पोल भी खोलता है, जहां रसूखदारों के लिए नियम अलग और आम जनता के लिए अलग दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि जिन लोगों पर हत्या, रंगदारी, धमकी, दंगा और हिंसा जैसे गंभीर आरोप हैं, उन्हें आखिर हथियार रखने की अनुमति किस आधार पर दी गई? क्या शस्त्र लाइसेंस अब कानून व्यवस्था की जरूरत नहीं बल्कि राजनीतिक कृपा का प्रमाणपत्र बन गए हैं?

उत्तर प्रदेश में बीते कई वर्षों से हथियारों का खुला प्रदर्शन एक फैशन और ताकत के प्रतीक के रूप में सामने आया है। सोशल मीडिया पर असलहों के साथ तस्वीरें डालना, राजनीतिक रैलियों में हथियारों के साथ समर्थकों की मौजूदगी, शादी समारोहों में फायरिंग और बाहुबलियों के काफिलों में लहराती बंदूकें—यह सब समाज को एक बेहद खतरनाक दिशा में धकेल रहा है। इससे युवाओं के बीच यह गलत संदेश जा रहा है कि कानून का सम्मान नहीं, बल्कि हथियार का भय ज्यादा प्रभावी होता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस गन कल्चर को कई बार राजनीतिक संरक्षण भी मिलता दिखाई देता है। चुनावों के दौरान बाहुबलियों की सक्रियता, नेताओं के साथ हथियारबंद समर्थकों की मौजूदगी और अपराधियों को मिलती सरकारी सुरक्षा यह संकेत देती है कि राजनीति और अपराध का गठजोड़ अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यही कारण है कि हाईकोर्ट को अब्बास अंसारी, बृजभूषण सिंह, राजा भैया समेत कई प्रभावशाली नामों की जानकारी तलब करनी पड़ी। अदालत का यह कदम केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सिस्टम को आईना दिखाने जैसा है।

हाईकोर्ट की यह टिप्पणी कि “जहां हथियार ताकत का प्रतीक बन जाएं, वहां कानून का डर कमजोर पड़ने लगता है” आज के सामाजिक और राजनीतिक माहौल की सटीक तस्वीर पेश करती है। जब अपराधी खुलेआम हथियारों के दम पर अपना प्रभाव कायम करने लगें और आम नागरिक भय के माहौल में जीने को मजबूर हो जाए, तब यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरे का संकेत होता है। कानून का राज तभी मजबूत माना जाता है जब आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस करे, न कि बाहुबलियों और हथियारबंद लोगों के साये में जीने को मजबूर हो।

अदालत की नाराजगी इस बात पर भी बेहद महत्वपूर्ण है कि कई प्रभावशाली लोगों की जानकारी हलफनामे में शामिल नहीं की गई। यह केवल एक तकनीकी चूक नहीं बल्कि व्यवस्था की नीयत पर सवाल खड़े करता है। यदि अदालत सख्ती न दिखाती, तो शायद यह जानकारी कभी सार्वजनिक ही नहीं होती। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर कहीं न कहीं ऐसे तत्व मौजूद हैं जो प्रभावशाली लोगों को बचाने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि अदालत ने अधिकारियों से लिखित अंडरटेकिंग मांगी है कि कोई तथ्य छिपाया नहीं गया है।

प्रदेश में हजारों अपीलों का लंबित होना और हजारों परिवारों के पास एक से अधिक शस्त्र लाइसेंस होना भी कई सवाल खड़े करता है। आखिर क्या हथियार अब जरूरत से ज्यादा प्रतिष्ठा और प्रभाव का साधन बन गए हैं? यदि एक ही परिवार में कई हथियार मौजूद हैं तो यह सामान्य सुरक्षा की जरूरत नहीं बल्कि ताकत के प्रदर्शन का संकेत माना जाएगा। ऐसे मामलों की गहन समीक्षा होना बेहद जरूरी है।

जरूरत इस बात की है कि प्रदेशभर में शस्त्र लाइसेंसों की व्यापक और निष्पक्ष जांच कराई जाए। जिन लोगों पर गंभीर आपराधिक मुकदमे लंबित हैं, उनके लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निरस्त किए जाएं। हथियारों के खुले प्रदर्शन, सोशल मीडिया पर असलहों के प्रचार और सार्वजनिक आयोजनों में फायरिंग जैसी घटनाओं पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त बनाना होगा।

उत्तर प्रदेश तेजी से विकास, निवेश और आधुनिक कानून व्यवस्था की ओर बढ़ने का दावा करता है। लेकिन यदि समाज में बंदूक का भय कानून के विश्वास से बड़ा हो जाए, तो यह विकास की छवि को भी कमजोर करता है। निवेश और विकास वहीं फलते हैं जहां कानून का राज मजबूत हो, न कि बाहुबलियों का असर।

आज जरूरत केवल अदालत की सख्ती की नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी है। सरकार और प्रशासन को यह तय करना होगा कि प्रदेश कानून से चलेगा या बंदूक की नली से। क्योंकि जहां हथियारों का आतंक लोकतंत्र पर हावी होने लगे, वहां धीरे-धीरे जंगलराज जन्म लेने लगता है।

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