प्रयागराज
इलाहाबाद हाईकोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दाखिल एक हलफनामे ने प्रदेश में शस्त्र लाइसेंस व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार ने कोर्ट को बताया कि राज्य में वर्तमान समय में 10,08,953 शस्त्र लाइसेंसधारी हैं, जिनमें 6,062 ऐसे लोग शामिल हैं जिन पर दो या उससे अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इस खुलासे पर हैरानी जताते हुए हाईकोर्ट ने सरकार से उन प्रभावशाली लोगों और बाहुबलियों का विस्तृत ब्योरा मांगा है, जिनका नाम हलफनामे में शामिल नहीं किया गया। कोर्ट ने 26 मई तक इन लोगों की आपराधिक पृष्ठभूमि, सरकारी सुरक्षा और उनके पास मौजूद हथियारों की जानकारी पेश करने का आदेश दिया है।
यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने संतकबीर नगर निवासी जय शंकर उर्फ बैरिस्टर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट पहले से ही प्रदेश में बढ़ते “गन कल्चर” और हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर चिंता जता चुका है। सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे में यह भी बताया गया कि 20,960 परिवारों के पास एक से अधिक शस्त्र लाइसेंस हैं और विभिन्न मामलों में 23,407 आवेदन अब भी लंबित पड़े हैं। साथ ही पुलिस प्रमुखों और जिलाधिकारियों के आदेशों के खिलाफ 1,738 अपीलें कमिश्नरों के पास विचाराधीन हैं। इन आंकड़ों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि स्थानीय प्रशासन कई बार राजनीतिक और सामाजिक रूप से प्रभावशाली लोगों की जानकारी छिपा लेता है, जिससे पारदर्शिता प्रभावित होती है।
कोर्ट ने कई चर्चित और प्रभावशाली व्यक्तियों के नामों का उल्लेख करते हुए उनके शस्त्र लाइसेंस और सुरक्षा व्यवस्था की जांच के निर्देश दिए हैं। इनमें अब्बास अंसारी, भाजपा नेता बृजभूषण सिंह, राजा भैया समेत कई नाम शामिल बताए गए हैं। अदालत ने पूछा है कि इन लोगों को किस श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है, कितने पुलिसकर्मी तैनात हैं और उनके पास कितने हथियार हैं। कोर्ट ने सभी जिलों के पुलिस कप्तानों और पुलिस कमिश्नरों को चेतावनी दी है कि वे जानकारी देते समय लिखित रूप से यह सुनिश्चित करें कि कोई तथ्य छिपाया नहीं गया है। यदि जानकारी छिपाने की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माना जाएगा।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि हथियारों का खुला प्रदर्शन समाज में भय और असुरक्षा की भावना पैदा करता है। भले ही इसे आत्मरक्षा के नाम पर सही ठहराया जाए, लेकिन जब हथियार डराने-धमकाने का माध्यम बन जाते हैं, तब वे सामाजिक सद्भाव के लिए खतरा बन जाते हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसा समाज शांतिप्रिय नहीं हो सकता जहां हथियारों के बल पर दबदबा कायम करने की कोशिश की जाती हो। इस मामले की अगली सुनवाई 26 मई को होगी, जिसमें सरकार को विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।


