भरत चतुर्वेदी
भारत तेजी से डिजिटल समाज में बदल रहा है। गांव से लेकर महानगर तक अब मोबाइल स्क्रीन ही सूचना, विचार और बहस का सबसे बड़ा माध्यम बन चुकी है। कभी सोशल मीडिया को आम आदमी की आवाज कहा जाता था। यह मंच उन लोगों के लिए उम्मीद बनकर उभरा था जिन्हें मुख्यधारा की व्यवस्था में जगह नहीं मिलती थी। लेकिन समय के साथ यही प्लेटफॉर्म अब झूठ, प्रायोजित प्रचार और डिजिटल दलाली का बड़ा अड्डा बनता जा रहा है।
आज स्थिति यह है कि कुछ इन्फ्लुएंसर और तथाकथित डिजिटल चेहरे पैसे लेकर नेताओं, कारोबारियों और विवादित संस्थानों की छवि चमकाने का कारोबार कर रहे हैं। हजारों रुपये में तैयार होने वाली रील्स और वीडियो जनता के सामने ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जो जमीन की हकीकत से बिल्कुल अलग होती है। कैमरे के सामने विकास दिखाई देता है, लेकिन कैमरा हटते ही टूटी सड़कें, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और बदहाल व्यवस्था सामने आ जाती है।
यह सिर्फ सोशल मीडिया का दुरुपयोग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना पर हमला है। लोकतंत्र में जनता की राय सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है, लेकिन जब राय को ही पैसे से प्रभावित किया जाने लगे, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे बाजार में बदलने लगता है। आज वही हो रहा है। सच को सजाकर नहीं, बल्कि खरीदकर पेश किया जा रहा है।
सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरे खेल में युवा वर्ग सबसे बड़ा निशाना बन रहा है। आज का युवा मोबाइल स्क्रीन पर सबसे ज्यादा समय बिताता है। उसकी सोच, पसंद, राजनीतिक समझ और सामाजिक दृष्टिकोण तेजी से डिजिटल कंटेंट से प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में जब लगातार चमकदार वीडियो, भावनात्मक संगीत और स्क्रिप्टेड संवादों के जरिए नेताओं को “मसीहा” और भ्रष्ट व्यवस्थाओं को “उपलब्धि” के रूप में दिखाया जाता है, तब वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
बेरोजगारी, शिक्षा संकट, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, किसानों की समस्याएं और महंगाई जैसे सवाल धीरे-धीरे सोशल मीडिया की चकाचौंध में गायब होने लगते हैं। जनता का ध्यान मुद्दों से हटाकर इमोशनल कंटेंट की ओर मोड़ दिया जाता है। यही डिजिटल प्रचार की सबसे खतरनाक चाल है।
चिंता की बात यह भी है कि कुछ इन्फ्लुएंसर बिना तथ्य जांचे प्रचार कर रहे हैं। कई लोग खुद को पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता की तरह पेश करते हैं, लेकिन उनका वास्तविक उद्देश्य “पेड कंटेंट” तैयार करना होता है। पैसे लेकर राजनीतिक पक्ष लेना, विरोधी खबरों को दबाना, फर्जी उपलब्धियां दिखाना और ट्रोल नेटवर्क के जरिए सवाल उठाने वालों को निशाना बनाना अब एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है।
भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। करोड़ों लोग रोजाना इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर सक्रिय रहते हैं। राजनीतिक दल और बड़े संस्थान अब टीवी विज्ञापनों से ज्यादा सोशल मीडिया प्रचार पर पैसा खर्च कर रहे हैं। कारण साफ है, मोबाइल स्क्रीन तक पहुंचना सबसे आसान, सस्ता और प्रभावी माध्यम बन चुका है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता सिर्फ दिखावे से ही प्रभावित होती रहेगी? क्या लोकतंत्र अब रील्स और एडिटेड वीडियो के भरोसे चलेगा? क्या वास्तविक पत्रकारिता, तथ्य और जमीनी रिपोर्टिंग की जगह सिर्फ वायरल कंटेंट ले लेगा?
सच यह है कि हर वायरल वीडियो सच्चाई नहीं होता। हर मुस्कुराता चेहरा ईमानदार नहीं होता। और हर इन्फ्लुएंसर निष्पक्ष नहीं होता। लोकतंत्र तभी सुरक्षित रह सकता है जब जनता देखने और समझने के बीच फर्क करना सीखे। कैमरे की चमक और वास्तविकता के बीच की दूरी को पहचानना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।


