– सुब्रत पाठक के बयान से बढ़ी थी पूरे प्रदेश में दूरी, अब डैमेज कंट्रोल में जुटी बीजेपी
– लोधी बाहुल्य क्षेत्र में कई लोस प्रत्याशियों को करनी पड़ी थी मशक्कत
– राजू भैया जैसे दिग्गज गए थे हार साक्षी महाराज,मुकेश राजपूत को भी मिले थे पहले से बहुत कम वोट
कन्नौज। लोकसभा चुनाव के बाद कन्नौज की राजनीति में लोधी समाज की नाराजगी भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द बनती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अब भाजपा संगठन इस नाराजगी को दूर करने और सामाजिक समीकरण साधने में जुट गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह वह विवादित बयान माना जा रहा है, जिसे लेकर पूर्व भाजपा सांसद सुब्रत पाठक लंबे समय तक चर्चाओं में रहे।
राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, लोकसभा चुनाव से पहले एक सार्वजनिक स्थल पर सुब्रत पाठक ने लोधी समाज के युवाओं को कथित तौर पर कहा था“तुमने वोट दिया नहीं, हमने वोट खरीदा…।” इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा बताया गया कि “यह वोट परंपरागत भाजपा का है, पार्टी से जुड़ोगे तो जब हम प्रत्याशी होंगे तो वोट दोगे ही।” यही बात उन्होंने पाल समाज को भी निशाना साधते हुए पूर्व मंत्री सतीश पाल से फोन पर कही थी जो की वायरल सुर्खियां बनी थी।
इन बयानों को लेकर खासकर लोधी और पाल समाज में गहरी नाराजगी फैल गई थी। समाजवादी पार्टी ने भी इसे मुद्दा बनाकर भाजपा को घेरने का प्रयास किया। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसका असर चुनावी समीकरणों पर भी देखने को मिला।
इसी बीच अंदरखाने की राजनीति को लेकर भी कई चर्चाएं सामने आ रही हैं। सूत्रों का दावा है कि तिर्वा से भाजपा विधायक कैलाश राजपूत अपने बेटे की राजनीतिक संभावनाओं को लेकर समाजवादी पार्टी नेतृत्व से संपर्क साधने में जुटे थे। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में यह चर्चा लगातार बनी हुई है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा को ओबीसी और विशेषकर लोधी समाज में बढ़ती नाराजगी का अहसास हो गया था। यही वजह रही कि संगठन को जल्दबाजी में सामाजिक संतुलन साधने के लिए बड़े फैसले लेने पड़े। चर्चा यह भी रही कि एक असीम अरुण जैसे मंत्री पहले से होने के बावजूद भाजपा ने आनन-फानन में संगठनात्मक और राजनीतिक संदेश देने के को कुछ महीनो के लिए लोधी चेहरे को राज्य मंत्री बनाने का फैसला लिया।
कन्नौज और आसपास के क्षेत्रों में लोधी समाज का प्रभाव लंबे समय से निर्णायक माना जाता रहा है। ऐसे में भाजपा किसी भी कीमत पर इस वर्ग की नाराजगी को चुनावी नुकसान में बदलने नहीं देना चाहती। अब देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा का यह “डैमेज कंट्रोल” कितना असर दिखाता है और आने वाले चुनावों में सामाजिक समीकरण किस करवट बैठते हैं।


