=कौन हैं अम्बी बिष्ट और क्यों उठ रहे सत्ता-सिस्टम से रिश्तों पर सवाल?
यूथ इंडिया संवाददाता
लखनऊ। प्रतीक यादव की मौत अब सिर्फ एक पारिवारिक त्रासदी नहीं रह गई है। जैसे-जैसे परतें खुल रही हैं, वैसे-वैसे “बिष्ट परिवार” और सत्ता-सिस्टम से उनके पुराने रिश्तों को लेकर नई चर्चाएं सामने आने लगी हैं। राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हो रही है, वह है अम्बी बिष्ट। आखिर कौन हैं अम्बी बिष्ट और क्यों उनका नाम अब इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में आ गया है?
सूत्रों और पुराने राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि वर्ष 1994 में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, उस दौरान पत्रकार अरविंद सिंह बिष्ट की पत्नी अम्बी बिष्ट को नगर विकास विभाग में नौकरी दिलाई गई थी। इसके बाद जब-जब समाजवादी पार्टी सत्ता में आई, तब-तब उनकी तैनाती कथित रूप से लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी में प्रभावशाली पदों पर बनी रही।
अंदरखाने यह भी चर्चा है कि अम्बी बिष्ट से जुड़ी कई जांच फाइलें वर्षों से दबाई गईं, हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि अब तक सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है। लेकिन राजनीतिक विरोधी इस पुराने सत्ता-संबंध को अब प्रतीक यादव की मौत के घटनाक्रम से जोडक़र देख रहे हैं।
करीबी सूत्रों का दावा है कि नेताजी मुलायम सिंह यादव और साधना गुप्ता के निधन के बाद प्रतीक यादव धीरे-धीरे अपने ससुराल पक्ष के प्रभाव में आ गए थे। इसी बीच अपर्णा यादव के भाई अमन बिष्ट का नाम भी चर्चाओं में तेजी से उभरा। बताया जाता है कि लखनऊ के एक व्यापारी ने अमन बिष्ट पर करोड़ों रुपये के लेनदेन को लेकर मुकदमा दर्ज कराया था। हालांकि इस मामले में भी विस्तृत आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं है।
सबसे चौंकाने वाली चर्चा जनवरी माह की एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर हो रही है। सूत्रों के मुताबिक उस समय प्रतीक यादव ने भावुक होकर अपने परिवार को याद करते हुए तलाक तक का संकेत देने वाला संदेश पोस्ट कर दिया था। बाद में अपर्णा यादव के भाई अमन बिष्ट ने सामने आकर दावा किया कि प्रतीक की सोशल मीडिया आईडी “हैक” हो गई थी। लेकिन यह मामला उसी समय राजनीतिक और पारिवारिक हलकों में बड़ी चर्चा बन गया था।
अब मौत वाले दिन की परिस्थितियों को लेकर भी सवाल और गहरे हो रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिस समय सुबह प्रतीक यादव किचन में गिरे, उस वक्त अपर्णा यादव घर पर मौजूद नहीं थीं। सूत्रों के अनुसार अमन बिष्ट और उनकी मां घर पर थे। इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि लखनऊ में वेदांता जैसे बड़े निजी अस्पताल मौजूद होने के बावजूद प्रतीक यादव को सरकारी सिविल अस्पताल क्यों ले जाया गया? आखिर उस समय मेडिकल निर्णय किसने लिया?
मामले को और रहस्यमयी यह तथ्य बना रहा है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही अपर्णा यादव सार्वजनिक रूप से सामने आईं, जबकि अखिलेश यादव सुबह ही पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए थे। इससे सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
अंदरखाने कुछ लोग यह आरोप भी लगा रहे हैं कि प्रतीक यादव को मानसिक रूप से बेहद अकेला कर दिया गया था। वहीं दबी जुवाने कुछ अतिरंजित दावे “स्लो प्वाइजन” तक की चर्चाओं में बदल रहीं हैं। हालांकि अब तक किसी जांच एजेंसी, मेडिकल रिपोर्ट या आधिकारिक दस्तावेज में इस तरह के किसी आरोप की पुष्टि नहीं हुई है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि बिना वैज्ञानिक और फोरेंसिक प्रमाण के किसी मौत को जहर या साजिश से जोडऩा गंभीर मामला हो सकता है। लेकिन यह भी सच है कि हाई-प्रोफाइल मौतों में जब सवाल ज्यादा और जवाब कम हों, तब अफवाहें तेजी से फैलती हैं।
प्रतीक यादव मौत प्रकरण में बिष्ट फैक्टर की एंट्री!


