नई दिल्ली
दिल्ली शराब नीति मामले में एक बड़ा न्यायिक घटनाक्रम सामने आया है। अरविन्द केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से जुड़े आबकारी नीति मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने अदालत और अपने खिलाफ सोशल मीडिया पर की जा रही कथित अपमानजनक टिप्पणियों पर कड़ा रुख अपनाते हुए अवमानना कार्रवाई शुरू करने का फैसला लिया है। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने और न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश किसी भी हालत में स्वीकार नहीं की जाएगी।
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि उनके संज्ञान में आया है कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर अदालत और न्यायाधीश के खिलाफ घृणित, मानहानिकारक और अवमाननापूर्ण टिप्पणियां कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह इस पूरे मामले पर चुप नहीं रह सकतीं और ऐसे लोगों के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाएगी। अदालत के इस सख्त रुख के बाद राजनीतिक और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
यह मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें फरवरी महीने में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 21 आरोपियों को दिल्ली शराब नीति मामले में बरी कर दिया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान केजरीवाल पक्ष ने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा से खुद को मामले से अलग करने की मांग की थी। आरोप लगाया गया था कि न्यायमूर्ति के परिवार के सदस्य केंद्र सरकार के पैनल वकीलों से जुड़े हैं, इसलिए निष्पक्ष सुनवाई संभव नहीं होगी।
हालांकि न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि केवल आधारहीन आशंकाओं के आधार पर कोई न्यायाधीश खुद को मामले से अलग नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता सर्वोपरि है और अदालत किसी दबाव में काम नहीं करती। अदालत ने 20 अप्रैल को रिक्यूजल याचिका खारिज कर दी थी।
रिक्यूजल याचिका खारिज होने के बाद अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और आप नेता दुर्गेश पाठक ने अदालत में पेश होने से इनकार कर दिया था। उन्होंने इसे “सत्याग्रह” बताते हुए कहा था कि जब तक निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित नहीं होती, वे अदालत की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे। इसके बाद हाईकोर्ट ने बिना प्रतिनिधित्व वाले आरोपियों की पैरवी के लिए तीन वरिष्ठ वकीलों को न्याय मित्र नियुक्त करने का निर्णय लिया था।
गौरतलब है कि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा स्वयं इस मामले से अलग नहीं हुई हैं, लेकिन आबकारी नीति मामले की आगे की सुनवाई अब दूसरी पीठ करेगी। इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायपालिका, राजनीति और सोशल मीडिया की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।


