प्रयागराज
वर्ष 1980 में प्रयागराज कचहरी परिसर में हुई सनसनीखेज हत्या की घटना के पीछे गांव की पुरानी रंजिश और खेत विवाद मुख्य वजह बताई गई। यह मामला उस समय पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गया था, क्योंकि दिनदहाड़े अदालत परिसर में गोलीबारी कर एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। अदालत में पेश साक्ष्यों और गवाहों के बयान के अनुसार, नवाबगंज थाना क्षेत्र के हथिगहां गांव में दो पक्षों के बीच जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था, जिसने बाद में खूनी रूप ले लिया।
मृतक प्रकाश नारायण पांडेय अपने परिवार की ओर से चल रहे एक मुकदमे में जमानत कराने के लिए 11 फरवरी 1980 को प्रयागराज कचहरी पहुंचे थे। बताया गया कि उनके परिवार की गांव के संतराम और बलराम से खेत को लेकर पुरानी दुश्मनी थी। इसी विवाद में पहले से एफआईआर भी दर्ज थी और दोनों पक्षों में तनाव लगातार बढ़ रहा था। कचहरी परिसर में मौजूद लोगों के अनुसार, जैसे ही प्रकाश नारायण अदालत परिसर पहुंचे, उन पर अचानक हमला कर दिया गया और गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। घटना के बाद परिसर में अफरा-तफरी मच गई थी।
मामले में मृतक के बड़े भाई श्याम नारायण पांडेय ने अदालत में बयान देते हुए बताया कि खेत विवाद को लेकर उनके परिवार को लगातार धमकियां मिल रही थीं। उन्होंने कहा कि यह हत्या पूर्व नियोजित थी और आरोपियों ने बदले की भावना से इस वारदात को अंजाम दिया। अदालत में पेश गवाहों और दस्तावेजों से यह भी स्पष्ट हुआ कि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ था, जिसकी कई बार पंचायत और पुलिस स्तर पर शिकायत भी की गई थी।
यह मामला उस समय और अधिक हाई प्रोफाइल बन गया, जब मुकदमे से जुड़ी महत्वपूर्ण पत्रावली रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। आरोप लगे कि फाइल गायब कर आरोपियों को बचाने की कोशिश की गई, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने अदालत में मजबूती से पैरवी करते हुए साक्ष्य प्रस्तुत किए। एडीजीसी क्रिमिनल सुशील कुमार वैश्य और विशेष लोक अभियोजक वीरेंद्र कुमार सिंह ने मामले को गंभीरता से रखते हुए अदालत के सामने सभी तथ्यों को विस्तार से रखा।
वहीं बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ताराचंद्र गुप्ता समेत अन्य वकीलों ने आरोपियों का पक्ष रखा और साक्ष्यों पर सवाल उठाए। लंबे समय तक चले इस चर्चित मुकदमे ने न केवल प्रयागराज बल्कि पूरे प्रदेश में न्याय व्यवस्था और अदालतों की सुरक्षा को लेकर बहस छेड़ दी थी। आज भी यह मामला प्रदेश के चर्चित आपराधिक मामलों में गिना जाता है, जिसने अदालत परिसर में सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया था।


