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Tuesday, May 12, 2026

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: एससी /एसटी एक्ट में “पब्लिक व्यू” यानी सार्वजनिक नजर के सामने होना जरूरी

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नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम यानी एससी /एसटी एक्ट की धाराओं को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध माने जाने के लिए कथित जातिसूचक गालियां या अपमान “किसी ऐसी जगह” पर होना चाहिए जो “पब्लिक व्यू” यानी सार्वजनिक नजर में हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि घटना ऐसी परिस्थिति में हुई हो जहां आम लोग उसे देख या सुन सकें। अदालत के अनुसार यदि घटना किसी निजी स्थान पर भी हुई हो, लेकिन वहां मौजूद परिस्थितियां ऐसी हों कि बाहरी लोग घटना को देख या समझ सकें, तो उसे भी “पब्लिक व्यू” माना जा सकता है।
अदालत की टिप्पणी के अनुसार
> “एससी /एसटी एक्ट के सेक्शन 3(1)(r) और/या 3(1)(s) के तहत अपराध बनाने के लिए घटना का होना और जाति-आधारित गालियां देने का कार्य ‘किसी ऐसी जगह’ पर होना चाहिए जो सबके सामने हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि “पब्लिक व्यू” का अर्थ केवल सार्वजनिक सड़क या बाजार नहीं है। यदि कोई निजी परिसर भी ऐसी स्थिति में है जहां आम लोग घटना देख सकें या वहां मौजूद हों, तो वह भी इस कानूनी दायरे में आ सकता है।
एससी /एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति का सार्वजनिक रूप से अपमान या बेइज्जती करना अपराध माना जाता है। वहीं धारा 3(1)(s) जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल से जुड़े मामलों पर लागू होती है।

इन धाराओं के तहत दोष सिद्ध होने पर आरोपी को गिरफ्तारी, जेल और अन्य कठोर कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि “पब्लिक व्यू” की व्याख्या कई मामलों में बेहद अहम कानूनी बिंदु बन जाती है।
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट पहले भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुके हैं कि निजी बातचीत या बंद कमरे में कही गई बात हर स्थिति में एससी /एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं मानी जा सकती, जब तक यह साबित न हो कि घटना सार्वजनिक नजर या सार्वजनिक उपस्थिति में हुई थी।

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