शरद कटियार
उत्तर प्रदेश लंबे समय तक अपराध, माफिया राज और कमजोर कानून व्यवस्था की बहसों के केंद्र में रहा। लेकिन अब वही प्रदेश महिला अपराध मामलों में देश का सबसे मजबूत “कन्विक्शन मॉडल” बनकर सामने आया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2024 रिपोर्ट में महिला अपराध मामलों में यूपी का 76.6 प्रतिशत कन्विक्शन रेट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की राजनीति, पुलिसिंग और न्यायिक व्यवस्था पर बड़ा संदेश है।
यह वही उत्तर प्रदेश है जहां कभी महिला सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठते थे। लेकिन अब आंकड़े बता रहे हैं कि अपराधियों को सजा दिलाने के मामले में प्रदेश ने देश के बड़े और तथाकथित “विकसित” राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। महाराष्ट्र 8.7%, कर्नाटक 4.8%, तेलंगाना 14.8%, केरल 17%, पंजाब 19% और तमिलनाडु 23.4% जैसे आंकड़े यह साफ संकेत देते हैं कि केवल आधुनिकता या आर्थिक विकास से कानून का डर पैदा नहीं होता, उसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक दबाव भी जरूरी होता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर उत्तर प्रदेश में ऐसा क्या बदला कि अदालतों तक पहुंचने वाले मामलों में इतनी बड़ी संख्या में दोषियों को सजा मिलने लगी? इसका जवाब सीधे शासन की नीति और पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली में दिखाई देता है। योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालने के बाद कानून व्यवस्था को राजनीतिक एजेंडे का केंद्रीय मुद्दा बनाया। एंटी रोमियो स्क्वॉड, मिशन शक्ति, महिला हेल्पलाइन, फास्ट ट्रैक कोर्ट, त्वरित चार्जशीट और संवेदनशील मामलों में सीधे मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं ने पुलिस तंत्र पर लगातार दबाव बनाया कि महिला अपराध के मामलों में ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी।
यही वजह है कि अब केवल एफआईआर दर्ज करने तक मामला सीमित नहीं रहता, बल्कि विवेचना, साक्ष्य और कोर्ट में पैरवी तक प्रशासनिक निगरानी बढ़ी है। कन्विक्शन रेट बढ़ने का सबसे बड़ा अर्थ यही है कि जांच एजेंसियां अदालत में अपराध साबित करने लायक साक्ष्य प्रस्तुत कर पा रही हैं। यह किसी भी राज्य की कानून व्यवस्था का सबसे अहम पैमाना माना जाता है।
लेकिन इस सफलता के पीछे एक दूसरा सच भी छिपा है। देशभर की अदालतों में महिला अपराध से जुड़े 3,52,664 मामले लंबित होना बताता है कि न्याय व्यवस्था पर दबाव अब भी बहुत बड़ा है। 27,639 मामलों की सुनवाई पूरी होना और 21,169 मामलों में सजा मिलना सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन यह भी स्पष्ट करता है कि लाखों महिलाएं अब भी न्याय के इंतजार में हैं।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कन्विक्शन रेट बढ़ना तभी सार्थक माना जाएगा जब अपराध की घटनाओं में भी कमी आए। केवल सजा दिलाना पर्याप्त नहीं, बल्कि अपराध रोकना सबसे बड़ी चुनौती है। महिला सुरक्षा केवल पुलिसिंग का विषय नहीं बल्कि सामाजिक मानसिकता, पारिवारिक संस्कार, शिक्षा और राजनीतिक वातावरण से भी जुड़ा मुद्दा है।
पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की खराब स्थिति यह भी दर्शाती है कि जहां राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक टकराव और कमजोर जांच व्यवस्था हावी होती है, वहां महिला अपराध मामलों में न्यायिक परिणाम भी कमजोर पड़ जाते हैं। वहीं यूपी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि अपराधियों में भय और कानून में विश्वास एक साथ पैदा किया जा सकता है।
हालांकि विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों का एक वर्ग यह सवाल भी उठाता है कि क्या सख्ती की यह नीति हर स्तर पर संतुलित और निष्पक्ष है? क्या सभी मामलों में जांच पूरी पारदर्शिता से हो रही है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों और कमजोर वर्ग की महिलाओं को भी उतनी ही तेजी से न्याय मिल रहा है जितना बड़े मामलों में दिखाई देता है? ये सवाल भी लोकतंत्र में उतने ही जरूरी हैं।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि एनसीआरवी के ताजा आंकड़े उत्तर प्रदेश की छवि बदलने वाले साबित हो रहे हैं। कभी अपराध के लिए चर्चित रहने वाला राज्य अब महिला अपराधियों को सजा दिलाने में राष्ट्रीय उदाहरण बनने की कोशिश कर रहा है। आने वाले वर्षों में असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह मॉडल केवल आंकड़ों तक सीमित रहता है या वास्तव में महिलाओं के भीतर सुरक्षा और न्याय का भरोसा भी मजबूत करता है।
महिला सुरक्षा का नया मॉडल या सख्त कानून का असर?


