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Monday, May 4, 2026

संभल में ‘काम से पहचान’ बनाने वाले डीएम डॉ . राजेंद्र पेन्सिया अब संभालेंगे पीतल नगरी

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– 26 महीनों में बदली तस्वीर, अब मुरादाबाद की बारी
संभल। उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक सिस्टम में बड़े बदलाव के चलते संभल जिले को नई पहचान देने वाले जिलाधिकारी डॉ . राजेंद्र पेन्सिया का करीब 26 महीने के कार्यकाल के बाद तबादला कर दिया गया है। शासन ने उन्हें अब बड़े जनपद मुरादाबाद जिले की कमान सौंपी है।
यह सिर्फ एक ट्रांसफर नहीं, बल्कि संभल में एक ऐसे कार्यकाल का अंत है जिसे स्थानीय लोग “परिवर्तन काल” के रूप में देख रहे हैं। चर्चा यह है कि डॉ. पेंसिया ने जिले को सिर्फ प्रशासनिक सख्ती से नहीं, बल्कि विजन के साथ संभाला।
संभल, जो कभी कानून-व्यवस्था और अव्यवस्था के लिए चर्चाओं में रहता था, वहां उनके कार्यकाल में कंट्रोल, अनुशासन और भरोसे का माहौल बना। संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ी, पुलिस-प्रशासन का तालमेल बेहतर हुआ और घटनाओं पर त्वरित कार्रवाई ने हालात को स्थिर किया।
लेकिन असली पहचान बनी संभल की विरासत को पुनर्जीवित करने की। डॉ. पेंसिया ने जिले के 68 प्राचीन तीर्थ स्थलों और 19 ऐतिहासिक कूपों को फिर से जीवंत करने का अभियान चलाया। यह सिर्फ सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि इतिहास को वर्तमान से जोड़ने की रणनीति थी।
स्थानीय स्तर पर सर्वे, पुनर्निर्माण और संरक्षण कार्यों के जरिए इन स्थलों को चिन्हित कर विकसित किया गया। इसके पीछे साफ मकसद था संभल को धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के नक्शे पर लाना। इससे आने वाले समय में स्थानीय रोजगार और अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद भी जताई जा रही है।
विकास के मोर्चे पर भी काम दिखा। सड़कें सुधरीं, सफाई व्यवस्था मजबूत हुई, और जनसुनवाई को प्रभावी बनाया गया। खास बात यह रही कि डीएम खुद फील्ड में उतरकर निरीक्षण करते रहे जिससे अधिकारियों में जवाबदेही बढ़ी और काम की रफ्तार तेज हुई।
सूत्रों के मुताबिक, उनके कार्यकाल में शिकायतों के निस्तारण की गति बढ़ी और कई पुराने लंबित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया गया। यह बदलाव आम लोगों के बीच प्रशासन की छवि सुधारने में अहम साबित हुआ।
अब जब उन्हें मुरादाबाद की जिम्मेदारी दी गई है, तो नजर इस बात पर है कि क्या वहां भी वह इसी मॉडल को लागू कर पाएंगे।
संभल के लिए यह तबादला एक बड़ा मोड़ है। एक ऐसा अधिकारी, जिसने कानून-व्यवस्था, विकास और सांस्कृतिक विरासत—तीनों को एक साथ साधने की कोशिश की, अब दूसरे जिले की जिम्मेदारी संभालने जा रहा है।
जिले में चर्चा यही है 26 महीने का यह कार्यकाल केवल प्रशासन नहीं, बल्कि एक उदाहरण बन गया है कि इच्छाशक्ति हो तो सिस्टम भी बदल सकता है।

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