– सरकार के हर कानून पर संवैधानिक लगाम

शरद कटियार
भारत का संविधान नागरिकों को केवल अधिकार नहीं देता, बल्कि उन अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस हथियार भी देता है। इन्हीं हथियारों में सबसे ताकतवर प्रावधान है आर्टिकल 13,यह अनुच्छेद साफ शब्दों में कहता है कि कोई भी कानून, चाहे वह संसद बनाए या राज्य सरकार, अगर वह मौलिक अधिकारों के खिलाफ जाता है तो वह कानून स्वतः अमान्य हो जाएगा। यानी संविधान के सामने कोई भी कानून टिक नहीं सकता।
आर्टिकल 13 की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह सरकार की मनमानी पर सीधा अंकुश लगाता है। संविधान लागू होने से पहले जो भी कानून बनाए गए थे, अगर वे मौलिक अधिकारों से टकराते हैं तो वे उसी सीमा तक खत्म माने जाएंगे। वहीं संविधान लागू होने के बाद अगर कोई नया कानून बनाया जाता है और वह नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो वह शुरू से ही अवैध माना जाएगा। इस प्रावधान के चलते सरकार के हर फैसले पर एक संवैधानिक निगरानी बनी रहती है।
इस अनुच्छेद में “कानून” की परिभाषा भी बेहद व्यापक रखी गई है। इसमें सिर्फ संसद के एक्ट ही नहीं, बल्कि अध्यादेश, नियम, आदेश, नोटिफिकेशन और यहां तक कि स्थानीय प्रशासन के फैसले भी शामिल हैं। यानी कोई भी सरकारी आदेश अगर मौलिक अधिकारों के खिलाफ जाता है, तो उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है। यही वजह है कि आर्टिकल 13 को न्यायिक समीक्षा की नींव माना जाता है।
आर्टिकल 13 का सबसे बड़ा असर अदालतों की ताकत में दिखता है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को यह अधिकार मिलता है कि वे किसी भी कानून की वैधता की जांच करें और अगर वह संविधान के खिलाफ हो तो उसे रद्द कर दें। यही कारण है कि भारत में न्यायपालिका को “संविधान का रक्षक” कहा जाता है। कई ऐतिहासिक फैसलों में अदालतों ने आर्टिकल 13 के आधार पर सरकार के फैसलों को पलटा है और नागरिकों के अधिकारों को बचाया है।
सबसे चर्चित उदाहरण 1973 का केशवानंद भारती मामला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन उसकी “मूल संरचना” को नहीं बदल सकती। इसी तरह गोलकनाथ केस में भी अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकारों के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। ये फैसले दिखाते हैं कि आर्टिकल 13 केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर नागरिकों की आजादी की रक्षा करता है।
आज के दौर में जब नए-नए कानून लगातार बन रहे हैं,चाहे वह डिजिटल मीडिया से जुड़े हों, सुरक्षा कानून हों या अभिव्यक्ति की आजादी से संबंधित नियम,हर कानून को आर्टिकल 13 की कसौटी पर परखा जाता है। अगर कहीं भी अधिकारों का हनन दिखता है, तो वही अनुच्छेद उसे चुनौती देने का रास्ता खोलता है। यही वजह है कि यह अनुच्छेद लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है।
स्पष्ट तौर पर कहा जाए तो आर्टिकल 13 यह सुनिश्चित करता है कि देश में कानून नहीं, बल्कि संविधान सर्वोपरि रहेगा। सरकारें आएंगी-जाएंगी, नीतियां बदलेंगी, लेकिन नागरिकों के मौलिक अधिकार अटल रहेंगे। यही इस अनुच्छेद की असली ताकत है और यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुरक्षा।


