फर्रुखाबाद। सदर विधानसभा सीट इस बार सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक असंतोष का विस्फोट बनती नजर आ रही है। जमीनी हकीकत साफ संकेत दे रही है कि इस बार मुकाबला सीधे तौर पर ब्राह्मण बनाम ओबीसी फैक्टर के इर्द-गिर्द घूम सकता है। लेकिन इस जातीय समीकरण के पीछे असली आग प्रशासनिक भ्रष्टाचार और जनता की अनसुनी पीड़ा से भड़की है।
राजस्व और पुलिस तंत्र पर गंभीर आरोप, “सिस्टम ही बना शिकारी”
ग्राउंड रिपोर्ट में सबसे बड़ा मुद्दा सामने आ रहा है राजस्व विभाग से लेकर पुलिस तंत्र तक मनमानी और कथित भ्रष्टाचार। आरोप हैं कि लेखपाल स्तर से लेकर तहसीलदार तक अभिलेखों में हेराफेरी कर सरकारी जमीनों पर कब्जे करवाए जा रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि कई मामलों में स्थानीय लोग खुलकर कह रहे हैं कि “भूमाफिया नहीं, बल्कि खुद सिस्टम जमीनों का खेल कर रहा है।”
तहसील स्तर पर रिपोर्ट बदलने, फाइल दबाने और शिकायतों को ठंडे बस्ते में डालने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि दशकों बाद ऐसी खुली मनमानी देखने को मिल रही है, जहां रिकॉर्ड तक सुरक्षित नहीं हैं।
थानों में ‘न्याय’ गायब
पुलिस व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई पीड़ितों का आरोप है कि थानों में मुकदमे दर्ज नहीं किए जाते, उल्टा फरियादियों को ही टाल दिया जाता है। सिपाही से लेकर थानेदार तक की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। इससे कानून-व्यवस्था को लेकर जनता में असुरक्षा की भावना तेजी से बढ़ी है।
ब्राह्मण समाज में असंतोष, ओबीसी वोट बैंक पर नजर
सदर सीट पर पारंपरिक रूप से ब्राह्मण मतदाताओं का प्रभाव रहा है, लेकिन इस बार कमजोर और मध्यम वर्गीय ब्राह्मणों में भी नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। उनका आरोप है कि उनकी समस्याओं की अनदेखी की जा रही है और प्रशासनिक स्तर पर सुनवाई नहीं हो रही।
वहीं दूसरी ओर ओबीसी वोट बैंक को साधने के लिए अलग-अलग राजनीतिक रणनीतियां बन रही हैं। ऐसे में यह सीट साफ तौर पर जातीय ध्रुवीकरण की ओर बढ़ती दिख रही है।
जन प्रतिनिधि गायब, “दरबार बंद”
सबसे बड़ा सवाल जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर उठ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों में पहली बार ऐसा माहौल बना है, जब पीड़ित जनता को अपने जनप्रतिनिधि तक नहीं मिल पा रहे। “दरबार बंद” जैसी स्थिति ने लोगों के गुस्से को और भड़का दिया है।
जनता का कहना है कि जब सिस्टम और जनप्रतिनिधि दोनों ही दूर हो जाएं, तो लोकतंत्र का आधार ही कमजोर हो जाता है।
चुनाव में क्या होगा असर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार सदर सीट पर जातीय समीकरण के साथ-साथ “एंटी-एडमिनिस्ट्रेशन वेव” भी निर्णायक भूमिका निभा सकती है। अगर यह असंतोष वोट में बदल गया, तो बड़े-बड़े सियासी समीकरण धराशायी हो सकते हैं।
फर्रुखाबाद सदर की लड़ाई अब सिर्फ उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि जनता बनाम सिस्टम बनती जा रही है और यही इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी बन सकती है।


