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Friday, April 24, 2026

बिहार में विश्वास मत की जंग: ‘सेलेक्टेड बनाम इलेक्टेड’ की सियासत

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भरत चतुर्वेदी
पटना। बिहार विधानसभा में पेश हुआ विश्वास मत महज संवैधानिक औपचारिकता नहीं रहा, बल्कि इसने सत्ता के भीतर चल रही परत-दर-परत राजनीति को बेनकाब कर दिया। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा विश्वास प्रस्ताव रखते ही विपक्ष ने इसे सीधा “जनादेश बनाम सत्ता प्रबंधन” की लड़ाई में बदल दिया।
नेता प्रतिपक्ष तेजश्वी यादव का तीखा बयान—“इलेक्टेड सीएम को सेलेक्टेड सीएम ने हटाया”इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बनकर उभरा। यह सिर्फ एक तंज नहीं, बल्कि उस बड़े नैरेटिव का हिस्सा है जिसमें विपक्ष यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि सत्ता परिवर्तन जनता की इच्छा नहीं, बल्कि राजनीतिक गणित का परिणाम है।
बिहार की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां केवल आंकड़े नहीं, बल्कि चेहरों की स्वीकार्यता भी सत्ता तय करती है। ऐसे में सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री पद पर आना और तुरंत विश्वास मत का सामना करना यह संकेत देता है कि सरकार अपने बहुमत को लेकर आश्वस्त दिखना चाहती है, लेकिन भीतर कहीं न कहीं असहजता भी मौजूद है। विश्वास मत अक्सर तब लाया जाता है जब सत्ता को अपनी वैधता सार्वजनिक रूप से साबित करनी होती है और यही इस पूरे घटनाक्रम की असली पृष्ठभूमि है।
इस सियासी नाटक का सबसे चर्चित संवाद बना “पगड़ी” वाला बयान। तेजस्वी यादव का यह कहना कि “पगड़ी संभालकर रखिए, विजय सिन्हा की नजर है” केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर संभावित नेतृत्व संघर्ष की ओर सीधा इशारा है। यह सवाल उठाता है कि क्या मुख्यमंत्री की कुर्सी वास्तव में स्थिर है या फिर यह कुर्सी कई दावेदारों के बीच संतुलन का परिणाम है।
सत्ता पक्ष इस पूरे विवाद को विपक्ष की हताशा बताकर खारिज कर रहा है और दावा कर रहा है कि सरकार मजबूत है, बहुमत उसके साथ है और विकास ही उसका एजेंडा है। लेकिन भारतीय राजनीति का अनुभव कहता है कि केवल संख्याबल स्थिरता की गारंटी नहीं देता। जनस्वीकृति, संगठनात्मक एकजुटता और नेतृत्व की स्वीकार्यता ये तीनों ही असली कसौटी होती हैं।
यह विश्वास मत बिहार की राजनीति में सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि संभावित बदलाव का संकेत है। एक ओर सत्ता पक्ष इसे स्थिरता का प्रतीक बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं विपक्ष इसे “लोकतंत्र बनाम सत्ता प्रबंधन” की बहस में बदलकर राजनीतिक बढ़त लेने में जुटा है।
सबसे अहम सवाल अब भी कायम हैं क्या यह सरकार लंबे समय तक टिकाऊ साबित होगी?
क्या सत्ता के भीतर चल रही खींचतान थम पाएगी?
या फिर यह विश्वास मत एक बड़े सियासी तूफान की भूमिका है?
बिहार की राजनीति में हर मोड़ पर समीकरण बदलते हैं और सत्ता की दिशा भी। यह विश्वास मत उसी बदलते दौर का संकेत देता है—जहां हर बयान, हर इशारा और हर रणनीति आने वाले समय की राजनीति तय करने वाली है।

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