यूपी में 24 घंटे का प्रशासनिक भूचाल: 64 आईएएस तबादले, 25 जिलों की बदली कमान
– सुधार की आंधी या सत्ता की सर्जिकल स्ट्राइक?
– शरद कटियार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सत्ता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रशासनिक मशीनरी को झकझोरने में उसे देर नहीं लगती। महज 24 घंटे के भीतर 64 आईएएस अधिकारियों के तबादले और 25 जिलों के जिलाधिकारियों की कुर्सी बदल देना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सियासी-प्रशासनिक संदेश है—“काम करो या हटो”। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब प्रदेश में कानून-व्यवस्था, विकास योजनाओं की गति और भ्रष्टाचार पर सवाल लगातार उठ रहे थे।
रविवार देर रात 40 आईएएस अधिकारियों की सूची जारी होती है और सोमवार को 24 और नाम जोड़ दिए जाते हैं। यह केवल तबादला नहीं, बल्कि एक तरह की प्रशासनिक सर्जरी है जिसमें उन जिलों को खासतौर पर टारगेट किया गया जहां शिकायतें, भ्रष्टाचार या विकास कार्यों में सुस्ती की रिपोर्ट लगातार शासन तक पहुंच रही थी। आंकड़ों पर गौर करें तो कुल तबादलों में करीब 39% यानी 25 जिले सीधे तौर पर प्रभावित हुए—यह किसी भी राज्य के लिए एक बड़ा प्रशासनिक रिसेट माना जाता है।
सबसे ज्यादा चर्चा में वे जिले हैं जहां लंबे समय से शिकायतों का अंबार था। फर्रुखाबाद जैसे जिले में नए डीएम के रूप में डॉ. अंकुर लाठर की तैनाती यह संकेत देती है कि शासन यहां प्रशासनिक सख्ती चाहता है। वहीं अयोध्या, आगरा, रायबरेली, सहारनपुर और लखीमपुर खीरी जैसे संवेदनशील जिलों में डीएम बदलना सिर्फ रूटीन नहीं बल्कि रणनीतिक फैसला माना जा रहा है। खासकर आगरा में मनीष बंसल की तैनाती—जो नोएडा की डीएम मेधा रूपम के पति हैं—ने प्रशासनिक गलियारों में चर्चा को और गर्म कर दिया है। यह नियुक्ति योग्यता आधारित है या नेटवर्क आधारित, इस पर बहस तेज हो चुकी है।
अगर गहराई से देखा जाए तो यह फेरबदल तीन बड़े संकेत देता है। पहला—सरकार आने वाले समय में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। दूसरा—2027 के चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए प्रशासनिक ढांचा अभी से कसने की तैयारी है। और तीसरा—जिन जिलों में कानून-व्यवस्था या राजस्व से जुड़ी शिकायतें अधिक हैं, वहां “परफॉर्मेंस बेस्ड पोस्टिंग” का प्रयोग किया जा रहा है।
वरिष्ठ स्तर पर भी बदलाव कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। विशेष सचिव से लेकर मंडल आयुक्त और पावर कॉर्पोरेशन जैसे अहम विभागों में नई तैनातियां बताती हैं कि सरकार सिर्फ जिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शासन ढांचे को री-इंजीनियर कर रही है। दुर्गा शक्ति नागपाल को देवीपाटन मंडल का आयुक्त बनाना और किंजल सिंह को माध्यमिक शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी देना, ऐसे फैसले हैं जो सीधे तौर पर विकास और शासन की दिशा तय करेंगे।
लेकिन बड़ा सवाल यही है,क्या सिर्फ तबादलों से व्यवस्था सुधर जाएगी? पिछले आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में हर साल औसतन 200 से अधिक आईएएस अधिकारियों के तबादले होते हैं। इसके बावजूद भ्रष्टाचार, धीमी परियोजनाएं और प्रशासनिक लापरवाही की शिकायतें खत्म नहीं हुईं। यानी समस्या सिर्फ चेहरों की नहीं, सिस्टम की भी है।
कई जिलों में वहां बीते एक साल में विकास परियोजनाओं की प्रगति 60% से कम रही और जन शिकायतों का निस्तारण औसतन 45% के आसपास अटका रहा। ऐसे में यह बदलाव एक जरूरी झटका जरूर है, लेकिन अगर मॉनिटरिंग और जवाबदेही तय नहीं हुई तो यह भी सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगा।
यह भी साफ है कि सरकार ने संदेश दे दिया है—अब फाइलों की गति, कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस सिर्फ नारा नहीं रहेगा। आने वाले महीनों में यह देखा जाएगा कि नए डीएम और अफसर अपने जिलों में कितना बदलाव ला पाते हैं या फिर यह फेरबदल भी पुराने पैटर्न का हिस्सा बनकर रह जाता है।फिलहाल उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में हलचल है, कुर्सियां बदल चुकी हैं, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है—जमीन पर काम की।


