*डॉ. विजय गर्ग*
स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ हवा अत्यंत आवश्यक है, लेकिन आज वायु प्रदूषण भारत के सामने पर्यावरण की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन गया है। हर वर्ष, विशेषकर सर्दियों के महीनों में, अनेक शहरों और कस्बों की वायु गुणवत्ता खराब हो जाती है। पराली जलाने की समस्या पर अक्सर लोगों का ध्यान जाता है, लेकिन यह एक बड़ी समस्या का केवल एक हिस्सा है। सड़कों की धूल, निर्माण कार्य, कचरा जलाना, वाहनों से निकलने वाला धुआँ और औद्योगिक प्रदूषण भी हवा को दूषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यदि हम वास्तव में स्वच्छ हवा चाहते हैं, तो हमें किसी एक कारण तक सीमित रहने के बजाय उन सभी गतिविधियों पर ध्यान देना होगा, जो हमारे वातावरण को प्रदूषित करती हैं।
## पराली जलाना: एक मौसमी चुनौती
पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्यों में पराली जलाना हर वर्ष एक बड़ी मौसमी चुनौती बन जाता है। धान की कटाई के बाद कुछ किसान अगली फसल की बुवाई के लिए खेतों को जल्दी तैयार करने के उद्देश्य से फसल के अवशेषों को जला देते हैं। इससे धुआँ, सूक्ष्म कण और अन्य हानिकारक प्रदूषक वातावरण में फैल जाते हैं।
हालाँकि, किसानों को फसलों के बीच कम समय मिलने, मशीनों की अधिक लागत और बड़ी मात्रा में पराली के प्रबंधन जैसी व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। केवल किसानों को दोष देने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्हें सस्ती मशीनें, समय पर तकनीकी सहायता, वित्तीय प्रोत्साहन और फसल अवशेषों के उपयोग के लिए विश्वसनीय बाजार उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
फसल अवशेषों से जैविक खाद, जैव ऊर्जा, बायोगैस और औद्योगिक उपयोग की सामग्री तैयार की जा सकती है। ऐसे विकल्पों को प्रोत्साहित करने से प्रदूषण कम होने के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
## सड़कों की धूल और निर्माण कार्यों से प्रदूषण
धूल भी वायु गुणवत्ता खराब होने का एक प्रमुख कारण है, विशेषकर तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों में। कच्ची सड़कें, टूटी सड़कें, खुले में रखी निर्माण सामग्री, इमारतों को तोड़ने के कार्य और निर्माण स्थलों का खराब प्रबंधन हवा में धूल फैलाते हैं। धूल भरी सड़कों पर चलने वाले वाहन इन कणों को दोबारा हवा में उड़ा देते हैं। ये कण साँस के माध्यम से लोगों के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
निर्माण कार्यों के दौरान प्रदूषण कम करने के लिए सामग्री को ढकना, आवश्यकतानुसार पानी का छिड़काव करना, निर्माण स्थलों को उचित रूप से घेरना और मलबे को ढके हुए वाहनों में ले जाना आवश्यक है। सड़कों के किनारों को पक्का और साफ रखा जाना चाहिए। मशीनों द्वारा नियमित सफाई करने से भी जमा हुई धूल कम की जा सकती है।
नगर निकायों और स्थानीय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्माण संबंधी नियमों का नियमित और प्रभावी ढंग से पालन हो।
## कचरा जलाना: प्रदूषण का रोका जा सकने वाला स्रोत
घरेलू कचरे, प्लास्टिक, पत्तों और अन्य अपशिष्ट पदार्थों को खुले स्थानों पर जलाना खतरनाक और अनावश्यक है। कचरा जलने से धुआँ, सूक्ष्म कण और संभावित रूप से विषैले रसायन हवा में फैलते हैं। विशेष रूप से प्लास्टिक और मिश्रित कचरे को जलाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
इस समस्या के प्रमुख कारणों में कचरा संग्रहण की अपर्याप्त व्यवस्था, कचरे को अलग-अलग करने की आदत का अभाव और उचित निपटान सुविधाओं की कमी शामिल हैं। जब कचरा उठाने की व्यवस्था नियमित नहीं होती या मोहल्लों में उचित सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होतीं, तो लोग कभी-कभी कचरे को जला देते हैं।
प्रत्येक घर में गीले कचरे, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री और शेष कचरे को अलग-अलग रखना चाहिए। गीले कचरे से जैविक खाद बनाई जा सकती है, जबकि कागज, धातु, काँच और उपयुक्त प्लास्टिक को पुनर्चक्रण के लिए भेजा जा सकता है।
नगर निकायों को घर-घर से कचरा एकत्र करने, खुले में कचरा फेंकने पर रोक लगाने और कचरा जलाने की अवैध गतिविधियों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए प्रभावी व्यवस्था करनी चाहिए।
जन-जागरूकता के साथ-साथ आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना भी जरूरी है। यदि उचित व्यवस्था ही नहीं होगी, तो लोगों के लिए कचरे का जिम्मेदारी से प्रबंधन करना कठिन हो जाएगा।
## वाहन और उद्योग भी जिम्मेदार हैं
वायु प्रदूषण केवल खेतों, सड़कों और कचरे से ही नहीं होता। कारों, मोटरसाइकिलों, ट्रकों और बसों से निकलने वाला धुआँ भी सूक्ष्म कणों और हानिकारक गैसों का स्रोत है। औद्योगिक उत्सर्जन और डीजल जनरेटर भी स्थानीय वायु गुणवत्ता को खराब कर सकते हैं।
बेहतर सार्वजनिक परिवहन, वाहनों की नियमित जाँच और रखरखाव, स्वच्छ ईंधन तथा प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों को अपनाकर इन स्रोतों से होने वाले प्रदूषण को कम किया जा सकता है। उद्योगों को निर्धारित उत्सर्जन मानकों का पालन करना चाहिए। अधिकारियों को प्रदूषण की निगरानी करके नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध उचित कार्रवाई करनी चाहिए।
जहाँ सुरक्षित और व्यावहारिक हो, वहाँ पैदल चलने, साइकिल चलाने और साझा परिवहन को प्रोत्साहित करके निजी वाहनों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
## क्या किया जाना चाहिए?
स्वच्छ हवा के लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन, किसानों, उद्योगों और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा।
सबसे पहले, वायु गुणवत्ता की निगरानी केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी निगरानी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों की पहचान करके स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान तैयार किए जाने चाहिए।
दूसरा, पर्यावरण संबंधी नियमों को निष्पक्षता और निरंतरता के साथ लागू किया जाना चाहिए। नियम तभी प्रभावी होते हैं, जब उल्लंघन की पहचान हो और उसे रोकने के लिए उचित कार्रवाई की जाए।
तीसरा, किसानों को पराली जलाए बिना उसके प्रबंधन के लिए सहायता दी जानी चाहिए। आर्थिक सहायता, साझा मशीनरी केंद्र और कृषि अवशेषों के उपयोग के लिए लाभकारी बाजार टिकाऊ विकल्पों को अपनाना आसान बना सकते हैं।
चौथा, शहरी स्थानीय निकायों को सड़कों के रखरखाव, निर्माण स्थलों की धूल पर नियंत्रण तथा कचरा संग्रहण, पृथक्करण, पुनर्चक्रण और निपटान की प्रभावी व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए।
अंत में, स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संगठनों और मीडिया को लोगों में यह समझ विकसित करनी चाहिए कि स्वच्छ हवा सभी की साझा जिम्मेदारी है। पर्यावरण शिक्षा केवल नारों और विशेष दिवसों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि लोगों को व्यवहार में पर्यावरण के अनुकूल आदतें अपनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
## स्वच्छ हवा अधिकार है, विलासिता नहीं
वायु प्रदूषण सभी को प्रभावित करता है, लेकिन बच्चे, बुजुर्ग और श्वसन या हृदय संबंधी समस्याओं से पीड़ित लोग इसके प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। प्रदूषित हवा अस्थमा और साँस से जुड़ी अन्य समस्याओं को बढ़ा सकती है तथा हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकती है। इसका प्रभाव स्वास्थ्य के साथ-साथ कार्यक्षमता, जीवन की गुणवत्ता और पर्यावरण पर भी पड़ता है।
हमें वायु प्रदूषण को केवल सर्दियों की अस्थायी समस्या मानना बंद करना होगा। यह वर्ष भर बनी रहने वाली चुनौती है, जिसके समाधान के लिए निरंतर योजना, वैज्ञानिक निगरानी और जनभागीदारी आवश्यक है।
अब सवाल यह नहीं है कि पराली जलाना, धूल या कचरा प्रदूषण में योगदान देता है या नहीं। वास्तविक सवाल यह है कि क्या हम इन सभी स्रोतों से समान गंभीरता के साथ निपटने के लिए तैयार हैं?
स्वच्छ हवा केवल कभी-कभार चलाए जाने वाले अभियानों, अस्थायी प्रतिबंधों या एक-दूसरे पर दोष लगाने से प्राप्त नहीं की जा सकती। इसके लिए व्यावहारिक समाधान, जिम्मेदार व्यवहार और निरंतर सहयोग की आवश्यकता है।
जिस दिन हमारे खेतों में फसल अवशेषों का टिकाऊ प्रबंधन होगा, सड़कों पर अनावश्यक धूल नहीं उड़ेगी, कचरे का उचित निपटान होगा और वाहन तथा उद्योग पर्यावरण के प्रति अधिक जिम्मेदारी से काम करेंगे, उस दिन हम स्वस्थ वातावरण की दिशा में वास्तविक प्रगति कर सकेंगे।
*स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण का लक्ष्य नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज की बुनियादी आवश्यकता है। कदम उठाने का समय अभी है, क्योंकि हर साँस अनमोल है।*
*डॉ. विजय गर्ग*
सेवानिवृत्त प्राचार्य | शैक्षिक स्तंभकार | प्रख्यात वैज्ञानिक
गली कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107
मोबाइल: 9465682110


