डॉ. विजय गर्ग
जब हम वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक सफलता के बारे में सोचते हैं, तो अक्सर हमारे मन में प्रतिष्ठित संस्थान, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, महंगी कोचिंग और प्रसिद्ध विश्वविद्यालय आते हैं। भारत में आईआईटी, आईआईएससी, एम्स और अन्य प्रमुख संस्थानों के नाम स्वाभाविक रूप से ध्यान में आते हैं। निस्संदेह, ये संस्थान विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान के लिए उत्कृष्ट अवसर प्रदान करते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण सत्य हमें कभी नहीं भूलना चाहिए—महान वैज्ञानिक केवल संस्थानों से नहीं बनते। वे जिज्ञासा, दृढ़ता, कल्पनाशक्ति, अनुशासन और प्रश्न पूछने के साहस से बनते हैं।
कई प्रतिभाशाली लोगों की यात्रा आधुनिक प्रयोगशालाओं से बहुत दूर—गाँवों, छोटे शहरों और साधारण परिवारों से शुरू होती है।
गाँव के किसी बच्चे के पास अत्याधुनिक उपकरण, निजी कोचिंग या बड़ी लाइब्रेरी न हो, लेकिन उसके पास उतनी ही मूल्यवान चीज हो सकती है—अपने आसपास की दुनिया को जानने की जिज्ञासा। किसान का खेत उसके लिए प्रयोगशाला बन सकता है। रात का आकाश खगोल विज्ञान की कक्षा बन सकता है। साइकिल, पानी का पंप, बीज, पक्षी, कीट या कोई खराब मशीन वैज्ञानिक प्रश्नों को जन्म दे सकती है।
ग्रामीण भारत ऐसे अवलोकन के अवसरों से भरा हुआ है।
बीज को अंकुरित होते देखकर कोई बच्चा सोच सकता है कि कुछ पौधे दूसरों की तुलना में तेजी से क्यों बढ़ते हैं। कोई बच्चा सिंचाई की नाली में पानी के प्रवाह को देखकर इंजीनियरिंग के प्रति रुचि विकसित कर सकता है। तारों से आकर्षित कोई बच्चा खगोलशास्त्री बनने का सपना देख सकता है। रेडियो, साइकिल या कृषि उपकरणों की मरम्मत करने वाला विद्यार्थी मशीनों की कार्यप्रणाली समझने की स्वाभाविक प्रवृत्ति विकसित कर सकता है।
वैज्ञानिक सोच अक्सर डिग्री से नहीं, बल्कि एक प्रश्न से शुरू होती है।
इतिहास भी बताता है कि वैज्ञानिक प्रतिभा केवल विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों तक सीमित नहीं है। भारत के कई प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने साधारण परिस्थितियों से अपनी यात्रा शुरू की और अनेक कठिनाइयों के बावजूद अपनी पहचान बनाई।
सर सी. वी. रमन, भारत के महान भौतिक वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता, ने आईआईटी से अपनी वैज्ञानिक यात्रा शुरू नहीं की थी। प्रकाश के प्रकीर्णन पर उनका कार्य प्रसिद्ध रमन प्रभाव के रूप में जाना गया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि मौलिक वैज्ञानिक सोच केवल प्रतिष्ठित संस्थानों की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती।
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, जिन्हें लोकप्रिय रूप से भारत के “मिसाइल मैन” के रूप में याद किया जाता है, रामेश्वरम के एक साधारण परिवार से आए थे। एक छोटे से तटीय शहर से भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक उनकी यात्रा यह संदेश देती है कि शिक्षा, दृढ़ संकल्प और सपने जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
ऐसे अनेक वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, गणितज्ञों, चिकित्सकों और आविष्कारकों की कहानियाँ हैं, जिनका प्रारंभिक जीवन किसी बड़े या विशिष्ट शैक्षणिक संस्थान से बहुत दूर था।
इसका अर्थ यह नहीं है कि आईआईटी या अन्य प्रतिष्ठित संस्थान आवश्यक नहीं हैं। इसके विपरीत, वे उच्च शिक्षा, अनुसंधान सुविधाओं और बौद्धिक वातावरण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वास्तविक संदेश यह है कि प्रतिभा किसी संस्थान में प्रवेश लेने से पहले ही मौजूद होती है। एक प्रतिष्ठित संस्थान प्रतिभा को निखार सकता है, लेकिन वह जिज्ञासा को शून्य से पैदा नहीं कर सकता।
यह बात विशेष रूप से ग्रामीण भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
गाँवों में लाखों बच्चे असाधारण प्रतिभा रखते हैं, लेकिन उनमें से अनेक को उचित मार्गदर्शन, संसाधन और आत्मविश्वास नहीं मिल पाता। कुछ विद्यार्थी इसलिए बड़े सपने देखने से हिचकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि बड़ी उपलब्धियाँ केवल शहरों या प्रतिष्ठित स्कूलों के बच्चों के लिए हैं। इस सोच को बदलना होगा।
सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी यह सोचने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए—“मैं क्यों नहीं?”
इस आत्मविश्वास को पैदा करने में शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक अच्छा शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं करता। वह विद्यार्थियों को निरीक्षण करने, प्रश्न पूछने, प्रयोग करने और स्थापित धारणाओं को चुनौती देने के लिए प्रेरित करता है। अत्याधुनिक प्रयोगशाला के बिना भी शिक्षक दैनिक जीवन की वस्तुओं से विज्ञान की सरल गतिविधियाँ करवा सकते हैं।
एक गिलास पानी, चुंबक, पत्ता, छाया, साइकिल का पहिया या गाँव का तालाब—इनमें से कोई भी वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल की शुरुआत बन सकता है।
माता-पिता को भी समझना होगा कि महंगे संसाधन उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन बौद्धिक विकास का एकमात्र आधार नहीं हैं। बच्चों को किताबें, प्रोत्साहन, सोचने का समय और प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता चाहिए। हमें हमेशा यह पूछने के बजाय कि “तुम्हारे कितने अंक आए?”, कभी-कभी यह भी पूछना चाहिए—“आज तुमने क्या नया खोजा या सीखा?”
यदि स्कूल, शिक्षक, पुस्तकालय और समुदाय मिलकर काम करें, तो भारत के गाँव वैज्ञानिक जिज्ञासा के शक्तिशाली केंद्र बन सकते हैं।
डिजिटल तकनीक ने इस संभावना को और बढ़ा दिया है। आज किसी दूरदराज के गाँव में बैठा विद्यार्थी दुनिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों के व्याख्यान देख सकता है, डिजिटल पुस्तकें पढ़ सकता है, वैज्ञानिक सिमुलेशन का अध्ययन कर सकता है और दुनिया में हो रहे नए शोध एवं आविष्कारों के बारे में जान सकता है। गाँव की कक्षा और विश्व की आधुनिक प्रयोगशाला के बीच की भौगोलिक दूरी अब तेजी से कम हो रही है।
लेकिन केवल जानकारी तक पहुँच पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को ऐसे मार्गदर्शकों की आवश्यकता है, जो उन्हें सही और विश्वसनीय ज्ञान तथा गलत सूचना के बीच अंतर समझा सकें। उन्हें अपने ज्ञान को प्रयोग में बदलने के अवसर चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि उनकी पृष्ठभूमि उनके भविष्य की सीमा निर्धारित नहीं करती।
इसलिए हमें प्रतिभा को केवल शहर या पिनकोड के आधार पर मापना बंद करना होगा।
किसी विद्यार्थी का गाँव, स्कूल की इमारत, भाषा या पारिवारिक आर्थिक स्थिति उसके सपनों की ऊँचाई निर्धारित नहीं करनी चाहिए। भारत को हर क्षेत्र से वैज्ञानिक प्रतिभा की आवश्यकता है—पहाड़ों, रेगिस्तानों, खेतों, मछुआरा बस्तियों और छोटे शहरों से।
हो सकता है कि भारत का अगला महान वैज्ञानिक इस समय किसी आईआईटी की कक्षा में न बैठा हो। संभव है कि वह किसी गाँव के स्कूल में पेड़ के नीचे बैठकर किसी कीट को देख रहा हो, तारों का अध्ययन कर रहा हो, किसी मशीन की मरम्मत कर रहा हो या यह सोच रहा हो कि बारिश का पानी मिट्टी में गायब क्यों हो जाता है।
वही प्रश्न उसकी वैज्ञानिक यात्रा की शुरुआत बन सकता है।
विज्ञान का कोई शहरी पता नहीं होता। ज्ञान की कोई सामाजिक सीमा नहीं होती। प्रतिभा कहीं भी पनप सकती है।
यदि भारत को वास्तविक ज्ञान-समाज बनना है, तो उसे प्रतिभा की खोज केवल प्रतिष्ठित संस्थानों में ही नहीं, बल्कि गाँवों की साधारण कक्षाओं में भी करनी होगी।
भारत के विज्ञान का भविष्य आज किसी गाँव में बैठा हो सकता है। उसे केवल जिज्ञासा, अवसर और उस बच्चे पर विश्वास करने वाले किसी व्यक्ति की आवश्यकता है।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्राचार्य | शैक्षिक स्तंभकार | Eminent Scientist
स्ट्रीट कौर चंद, MHR मालोट, पंजाब – 152107
मोबाइल: 9465682110


