नई दिल्ली में इंडिया गठबंधन की आठवीं बैठक ने एक बार फिर देश की चुनावी व्यवस्था और उसकी पारदर्शिता से जुड़े सवालों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। विपक्षी दलों की बैठक में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से पहले की मतदाता सूची उपलब्ध कराने की मांग से लेकर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग तक कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने स्पष्ट रूप से कहा कि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता चाहता है और इस दिशा में सभी दल मिलकर प्रयास करेंगे। उनका यह आग्रह केवल एक राजनीतिक मांग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया में जनता के विश्वास से जुड़े व्यापक सवाल के रूप में भी देखा जा सकता है।
मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी कड़ी है। इसमें किसी योग्य मतदाता का नाम छूटना या किसी अपात्र व्यक्ति का नाम शामिल होना सीधे चुनाव की विश्वसनीयता से जुड़ता है। इसलिए एसआईआर से पहले की सूची और पुनरीक्षण के बाद की सूची में होने वाले बदलावों को सार्वजनिक रूप से समझना और उनकी जांच की पर्याप्त व्यवस्था होना आवश्यक है। राजनीतिक दलों की आपत्तियों के साथ-साथ निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया और उसके आंकड़ों को भी सार्वजनिक जांच के दायरे में रखा जाना लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
इसी क्रम में विपक्ष की बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग भी चर्चा में है। ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद लंबे समय से मौजूद हैं। निर्वाचन आयोग और विभिन्न न्यायिक प्रक्रियाओं के स्तर पर ईवीएम की सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग व्यवस्थाएं और स्पष्टीकरण सामने आते रहे हैं। ऐसे में इस बहस का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि प्रमाण, तकनीकी जानकारी और पारदर्शी प्रक्रियाओं के आधार पर होना चाहिए।
इंडिया गठबंधन की बैठक में 19 दलों की भागीदारी यह संकेत देती है कि चुनावी सुधार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े मुद्दे विपक्ष के लिए साझा राजनीतिक विषय बन रहे हैं। हालांकि विपक्षी दलों के बीच रणनीति और प्राथमिकताओं को लेकर भी अंतर हो सकता है। इसलिए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बैठक में उठाए गए मुद्दे केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहते हैं या इनके आधार पर कोई ठोस संयुक्त पहल सामने आती है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर संभावित संसदीय रणनीति की चर्चा भी इसी व्यापक संदर्भ का हिस्सा है। संसद में प्रस्ताव अथवा संयुक्त कार्रवाई जैसे विकल्पों पर विचार की बात सामने आई है, लेकिन ऐसे किसी भी कदम का महत्व उसके संवैधानिक आधार, तथ्यात्मक सामग्री और संसदीय प्रक्रिया के अनुरूप होने से तय होगा।
लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। विपक्ष का दायित्व सवाल उठाना है, जबकि निर्वाचन आयोग का दायित्व चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखना है। जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मतदाता सूची, मतदान प्रतिशत, मतदान रिकॉर्ड और चुनाव परिणामों से संबंधित जानकारी स्पष्ट, सत्यापन योग्य और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।
चुनाव केवल मतदान का दिन नहीं है। चुनाव की विश्वसनीयता मतदाता सूची तैयार होने से शुरू होकर मतदान, मतों की गिनती और परिणाम घोषित होने तक पूरी प्रक्रिया से तय होती है। इसलिए राजनीतिक दलों द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब भी उसी व्यापक प्रक्रिया की पारदर्शिता के माध्यम से मिलना चाहिए।
इंडिया गठबंधन की बैठक ने चुनावी व्यवस्था पर बहस को फिर सामने ला दिया है। अब जरूरत इस बात की है कि यह बहस आरोपों और प्रत्यारोपों से आगे बढ़कर प्रमाण, नियमों और संस्थागत पारदर्शिता पर केंद्रित हो। लोकतंत्र में अंतिम कसौटी यही है कि आम मतदाता को अपने मत की गोपनीयता, स्वतंत्रता और उसके सही तरीके से दर्ज होने पर भरोसा बना रहे।


