लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में युवा नेतृत्व को लेकर एक दिलचस्प तस्वीर सामने है। एक तरफ बहुजन समाज पार्टी में 31 वर्षीय आकाश आनंद को बार-बार ‘अपरिपक्व’ बताकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दूर किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव ने अपेक्षाकृत कम उम्र के कई चेहरों को चुनावी मैदान में उतारकर उन्हें जनता के बीच नेतृत्व का अवसर दिया।
समाजवादी पार्टी की युवा पंक्ति में पुष्पेंद्र सरोज, प्रिया सरोज, इकरा हसन, डॉ. रागिनी सोनकर, अंकित भारती, हिमांशु यादव और पूजा शुक्ला जैसे चेहरे चर्चा में आए। इन नेताओं को चुनावी राजनीति में अवसर मिला और कई ने कम उम्र में ही संसद या विधानसभा तक पहुंच बनाई।
मसलन, इकरा हसन 28 वर्ष की उम्र में सांसद बनीं, प्रिया सरोज 26 वर्ष की उम्र में संसद पहुंचीं और पुष्पेंद्र सरोज 25 वर्ष की उम्र में सांसद बने। इसी तरह डॉ. रागिनी सोनकर ने 30 वर्ष की उम्र में विधानसभा पहुंचकर युवा नेतृत्व का उदाहरण पेश किया। अंकित भारती और हिमांशु यादव जैसे युवा चेहरों को भी अपेक्षाकृत कम उम्र में चुनावी राजनीति में अवसर मिला।
अब यही तस्वीर बहुजन समाज के सामने एक राजनीतिक सवाल खड़ा करती है।
अगर इन युवाओं को चुनाव से पहले ‘अपरिपक्व’ कहकर रोक दिया जाता, तो क्या वे आज सदन में होते?
आकाश आनंद के समर्थकों का तर्क है कि यदि उनमें राजनीतिक कमियां हैं तो उन्हें दूर करने के लिए जिम्मेदारी और मैदान दोनों चाहिए। किसी युवा को जनता के बीच भेजे बिना, संगठन की जिम्मेदारी दिए बिना और फैसले लेने का अवसर दिए बिना उससे परिपक्व नेतृत्व की उम्मीद करना अपने आप में विरोधाभास है।
पेड़ को छाया देने से पहले उसे बढ़ने का मौका देना पड़ता है।
अखिलेश यादव ने युवाओं को टिकट देकर एक राजनीतिक जोखिम लिया। जीत की कोई गारंटी नहीं थी। लेकिन उन चेहरों को जनता के बीच जाने, चुनाव लड़ने और खुद को साबित करने का अवसर मिला। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है,अवसर पहले मिलता है, प्रमाण बाद में।
इसके उलट आकाश आनंद का बार-बार ऊपर आना और फिर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से हटा दिया जाना यह सवाल पैदा करता है कि क्या बसपा अपने युवा नेतृत्व को लेकर असमंजस में है?
यहां मायावती की आलोचना करना किसी व्यक्ति के राजनीतिक कद को कम करना नहीं है। मायावती देश की अनुभवी नेताओं में हैं और बसपा को मजबूत करने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही है। लेकिन अनुभव का सबसे बड़ा प्रमाण यही होना चाहिए कि वह अगली पीढ़ी को अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर दे।
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