– रोज लग रहे स्वास्थ्य कैंप, घर-घर बांटी जा रही राहत किट
– डीएम डॉ. अंकुर लाठर की सीधी निगरानी से ग्रामीणों में बढ़ा सरकार का भरोसा
फर्रुखाबाद। गंगा का पानी जब खेतों की मेड़ों को पार कर गांव की गलियों तक पहुंचता है, तब जिंदगी की सबसे छोटी जरूरत भी बड़ी चुनौती बन जाती है। कहीं चूल्हा बुझ जाता है तो कहीं पशुओं के चारे का संकट खड़ा हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई रुकती है और बुजुर्गों के लिए दवा तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। ऐसे कठिन समय में गंगापार में जिला प्रशासन ने राहत को सिर्फ सरकारी कागजों और आदेशों तक सीमित रखने के बजाय गांव-गांव और जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाने का अभियान तेजी से चल रहा है।
जिलाधिकारी डॉ. अंकुर लाठर की निगरानी में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में लगातार राहत एवं स्वास्थ्य सेवाएं संचालित की जा रही हैं। रोज स्वास्थ्य कैंप लगाए जा रहे हैं और गांव-गांव राहत किट वितरित की जा रही हैं। प्रशासनिक टीमें प्रभावित परिवारों तक पहुंचकर उनकी जरूरतों की जानकारी ले रही हैं, ताकि बीमारी, भूख और जरूरी सामान की कमी के कारण किसी परिवार को परेशानी न उठानी पड़े।
यह तस्वीर उस समय और ज्यादा भावुक हो जाती है जब राहत किट लेने के लिए कोई बुजुर्ग, महिला या बच्चा प्रशासनिक टीम के सामने खड़ा होता है। उसके हाथ में पहुंचने वाली राहत सामग्री महज सामान नहीं होती, बल्कि यह एहसास होता है कि संकट की इस घड़ी में कोई उसके साथ खड़ा है।
बीमारी से पहले बचाव की तैयारी
बाढ़ का पानी अपने साथ सिर्फ परेशानी नहीं लाता, बल्कि दूषित पानी, मच्छरों और जलभराव के कारण बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। इसी को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग की टीमें प्रभावित क्षेत्रों में कैंप लगाकर ग्रामीणों को चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध करा रही हैं।
प्रशासन की ओर से प्रभावित क्षेत्रों में दवाओं की उपलब्धता, साफ-सफाई, कीटनाशक छिड़काव और स्वास्थ्य सेवाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पशुओं के लिए भी चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं, क्योंकि ग्रामीण परिवारों के लिए उनके पशुधन का सुरक्षित रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य।
राहत की किट में सिर्फ सामान नहीं, उम्मीद है
बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए राहत किट का महत्व किसी आंकड़े से नहीं समझा जा सकता। जिस परिवार का घर पानी से घिरा हो, जिसके सामने रोज भोजन की चिंता हो, उसके दरवाजे पर प्रशासन की राहत टीम का पहुंचना अपने आप में बड़ी राहत है।
प्रशासन की ओर से पहले 50 बाढ़ प्रभावित परिवारों को राहत सामग्री किट वितरित की जा चुकी है। इसके साथ ही राहत वितरण को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। उद्देश्य यही है कि प्रभावित परिवारों को उनकी जरूरत के समय आवश्यक सामग्री उपलब्ध हो और कोई परिवार खुद को प्रशासन से उपेक्षित महसूस न करे।
डीएम की निगरानी ने बदला राहत अभियान का अंदाज
जिलाधिकारी डॉ. अंकुर लाठर स्वयं बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर व्यवस्थाओं की समीक्षा कर रही हैं। ग्रामीणों से सीधे बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनना और मौके पर अधिकारियों को आवश्यक निर्देश देना राहत अभियान को जमीनी रूप देता है।
बाढ़ की स्थिति में किसी अधिकारी के लिए सबसे आसान काम कार्यालय में बैठकर रिपोर्ट लेना होता है, लेकिन जब अधिकारी खुद प्रभावित गांवों तक पहुंचता है तो ग्रामीणों का भरोसा कई गुना बढ़ जाता है। यही भरोसा आज राहत अभियान की सबसे बड़ी ताकत बनता दिखाई दे रहा है।
जिलाधिकारी का मानना है कि बाढ़ में घर डूबता है तो सिर्फ दीवारें नहीं डूबतीं। किसी की गृहस्थी, किसी की फसल, किसी का पशुधन और किसी परिवार की महीनों की मेहनत पानी में चली जाती है। ऐसे समय में सरकार और प्रशासन की संवेदनशीलता ही प्रभावित व्यक्ति को यह विश्वास दिलाती है कि वह अकेला नहीं है।
गंगापार में लगातार लगाए जा रहे स्वास्थ्य कैंप और गांव-गांव पहुंचाई जा रही राहत किट इसी जनसरोकार की तस्वीर पेश कर रहे हैं। राहत का यह अभियान तब और सार्थक हो जाता है जब अधिकारी ग्रामीण की समस्या सिर्फ सुनते नहीं, बल्कि उसके समाधान के लिए मौके से ही व्यवस्था को सक्रिय करते हैं।
गंगा की लहरें भले ही गांवों की ओर बढ़ रही हों, लेकिन उनके बीच प्रशासन की टीमें भी उतनी ही मजबूती से ग्रामीणों के बीच खड़ी दिखाई दे रही हैं। एक हाथ में राहत की किट और दूसरे हाथ में दवा लेकर जब सरकारी टीम किसी बाढ़ पीड़ित के दरवाजे तक पहुंचती है, तो वहां शासन का चेहरा दिखाई देता है—और उस चेहरे में उम्मीद नजर आती है।यही उम्मीद बाढ़ के पानी से घिरे परिवारों के लिए सबसे बड़ा सहारा है।


