प्रो. एच. एन. शर्मा
भारत में कानून का राज तभी मजबूत हो सकता है, जब अपराध की जांच करने वाली एजेंसियां और विवेचना करने वाला अधिकारी राजनीतिक, प्रशासनिक और स्थानीय दबाव से मुक्त होकर काम कर सकें। जांच की निष्पक्षता किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ है। यदि विवेचक ही दबाव में होगा तो मजबूत कानून, बड़ी जांच एजेंसियां और कड़े दंड भी अपराध पर प्रभावी लगाम नहीं लगा पाएंगे।
देश में जांच एजेंसियों की कार्रवाई और उनके नतीजों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि जांच शुरू होना और अदालत में दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग चरण हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के मामले में 31 मार्च 2026 तक 8,851 ECIR दर्ज किए गए, 2,396 अभियोजन शिकायतें दाखिल हुईं और 60 मामलों में मुकदमे पूरे हुए। इनमें 56 मामलों में दोषसिद्धि हुई, यानी निस्तारित मामलों में दोषसिद्धि दर 93.33 प्रतिशत रही।
सीबीआई के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। उसकी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के दौरान अदालतों ने 702 मामलों में निर्णय दिया। इनमें 423 मामलों में दोषसिद्धि, 170 में बरी, 25 में डिस्चार्ज और 84 मामलों का अन्य कारणों से निस्तारण हुआ। सीबीआई की दोषसिद्धि दर 68.44 प्रतिशत रही। इसके साथ ही 31 मार्च 2025 तक 11,351 मामले विभिन्न अदालतों में विचाराधीन थे।
इन आंकड़ों को केवल एजेंसियों की सफलता या असफलता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि जांच कितनी निष्पक्ष, वैज्ञानिक और समयबद्ध है। किसी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक जांच, पूछताछ या मुकदमे की प्रक्रिया में उलझाए रखना भी न्याय के उद्देश्य को कमजोर करता है, जबकि वास्तविक अपराधी तक न पहुंच पाना समाज के लिए उससे भी बड़ा खतरा है।
राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। मार्च 2025 में सरकार ने संसद को बताया था कि पिछले दस वर्षों में ईडी ने राजनीतिक नेताओं के खिलाफ 193 मामले दर्ज किए, लेकिन केवल दो मामलों में दोषसिद्धि हुई। यह आंकड़ा अपने आप में किसी एजेंसी की मंशा पर फैसला सुनाने के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन यह जरूर बताता है कि जांच और अभियोजन की गुणवत्ता पर लगातार सार्वजनिक निगरानी आवश्यक है।
दूसरी बड़ी समस्या पुलिस व्यवस्था में मानव संसाधन की है। गृह मंत्रालय के संसद में दिए आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 4,15,315 स्वीकृत पुलिस पदों के मुकाबले 3,03,450 पुलिसकर्मी कार्यरत थे,यानी 1,11,865 पद खाली थे। पूरे देश में उस आंकड़े के समय 26,23,225 स्वीकृत पदों के मुकाबले 20,91,488 पुलिसकर्मी कार्यरत थे और 5,31,737 पद रिक्त थे।
जब पुलिस बल में इतनी बड़ी रिक्तियां हों, विवेचक पर कानून-व्यवस्था, वीआईपी ड्यूटी, धरना-प्रदर्शन, गश्त और अन्य जिम्मेदारियां भी हों, तब गुणवत्तापूर्ण विवेचना के लिए पर्याप्त समय मिलना कठिन है। ऐसे में विवेचना को अलग और पेशेवर व्यवस्था के रूप में विकसित करना जरूरी है। अपराध की जांच करने वाले अधिकारी को बार-बार बदलने के बजाय उसे केस के अंत तक जवाबदेह और स्वतंत्र जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।
स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि जांच एजेंसी कानून से ऊपर हो जाए। उलटे, स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। विवेचक को राजनीतिक निर्देश से स्वतंत्र, लेकिन कानून, अदालत और निर्धारित प्रक्रिया के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। हर महत्वपूर्ण जांच में केस डायरी, साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट और कार्रवाई का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित हो, ताकि बाद में यह देखा जा सके कि जांच किस आधार पर आगे बढ़ी।
आज आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें शिकायतकर्ता को न्याय मिले, आरोपी के अधिकार सुरक्षित रहें और अपराधी कानून की पकड़ से बच न सके। इसके लिए पुलिस की विवेचना शाखा को कानून-व्यवस्था से अलग करना, वैज्ञानिक जांच को बढ़ाना, फोरेंसिक ढांचे को मजबूत करना, विवेचकों की विशेषज्ञता बढ़ाना और उन्हें अनावश्यक तबादलों तथा बाहरी दबाव से बचाना जरूरी है।
जांच एजेंसियों के लिए भी स्पष्ट मानक तय होने चाहिए,मामला दर्ज करने से लेकर आरोपपत्र और अभियोजन तक प्रत्येक चरण की समयसीमा हो। जिस मामले में पर्याप्त साक्ष्य न मिले, उसे अनिश्चितकाल तक लटकाने के बजाय कानून के अनुसार बंद करने की व्यवस्था हो। वहीं जानबूझकर कमजोर जांच करने वाले अधिकारी पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
लोकतंत्र में जांच एजेंसी किसी सरकार की नहीं, कानून की एजेंसी होनी चाहिए। विवेचक किसी नेता, अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि संविधान और कानून के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। जब जांच निष्पक्ष होगी, अभियोजन मजबूत होगा और अदालत के सामने साक्ष्य टिकेगा, तभी दोषी को सजा और निर्दोष को सुरक्षा दोनों मिल सकेंगे।
देश को ऐसी जांच व्यवस्था चाहिए जिसमें सत्ता बदलने से जांच का चरित्र न बदले। स्वतंत्र जांच, स्वतंत्र विवेचक और मजबूत जवाबदेही,यही वह त्रिकोण है जो कानून के राज को मजबूत कर सकता है और अपराध पर वास्तविक लगाम लगा सकता है।
लेखक पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।


