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Tuesday, January 13, 2026

खादी महोत्सव की चमक : परंपरा और आधुनिकता का नया संगम

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शरद कटियार

खादी महोत्सव-2025 (Khadi Festivalने इस वर्ष जिस तरह की सफलता दर्ज की है, वह केवल बिक्री के आँकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि समाज की बदलती सोच और उपभोक्ता व्यवहार का महत्वपूर्ण संकेत भी देता है। गोमतीनगर स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित 10 दिवसीय आयोजन में 3.20 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड बिक्री होना यह बताता है कि खादी अब बीते समय की धरोहर भर नहीं, बल्कि नए भारत की पहचान बनती जा रही है। पिछले वर्ष की तुलना में 42 प्रतिशत की वृद्धि यह स्पष्ट संकेत है कि खादी का बाजार अब सीमित नहीं रहा—उसके ग्राहक वर्ग का दायरा तेजी से बढ़ रहा है।

इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है—युवा पीढ़ी का बढ़ता रुझान। परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन तलाशती नई पीढ़ी खादी को केवल कपड़ा नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में अपनाने लगी है। खादी के नए डिज़ाइन, प्राकृतिक हर्बल उत्पाद, जूट और माटी कला जैसे शिल्प—यह सब मिलकर खादी को एक संपूर्ण ‘लाइफ़स्टाइल ब्रांड’ के रूप में स्थापित कर रहे हैं। महोत्सव में आए कारीगरों की यह प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है कि भीड़ बढ़ने के साथ-साथ ग्राहकों में खरीदारी को लेकर उत्साह भी पहले से कहीं अधिक रहा। यह उत्साह न केवल अर्थव्यवस्था के लिए, बल्कि उन हजारों ग्रामीण कारीगर परिवारों के लिए भी सुखद संदेश है, जो खादी और ग्रामोद्योग से जुड़े हैं।

सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि आयोजन में स्थानीयता और स्वदेशी भाव का प्रभाव देखने को मिला। आज जब बाजार बड़े-बड़े ब्रांडों और आयातित वस्तुओं से भरा पड़ा है, तब खादी महोत्सव का सफल होना यह दिखाता है कि भारतीय उपभोक्ता अब अपनी मिट्टी, अपने शिल्प और अपने हुनर की ओर लौट रहा है। यह ‘वोकल फॉर लोकल’ के विचार की सबसे वास्तविक जमीन है।

समापन समारोह में बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी शिशिर का यह कहना कि “खादी अब केवल परिधान का विकल्प नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर और आधुनिक उपभोक्ता की साझा पहचान है”—एक व्यापक सत्य को सामने लाता है। खादी का यह नया अर्थ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तीनों स्तरों पर प्रभावी होता दिख रहा है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि खादी को केवल मौसमी मेलों तक सीमित न रखा जाए। सरकार, संस्थानों और निजी क्षेत्र को मिलकर खादी और ग्रामोद्योग को व्यापक बाजार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करना चाहिए।

यदि यह गति बनी रहती है, तो खादी न केवल कारीगरों की आजीविका का बड़ा सहारा बनेगी, बल्कि भारत की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का भी सशक्त स्तंभ साबित होगी। खादी महोत्सव की यह सफलता उसी उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती है।

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