फर्रुखाबाद। सदर विधानसभा क्षेत्र में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद राजनीतिक समीकरणों में बड़ा उलटफेर सामने आया है। प्रारंभिक आकलनों के अनुसार लगभग 1 लाख 20 हजार मतदाताओं के नाम सूची से हटे हैं। यह संख्या कुल मतदाताओं का बड़ा हिस्सा मानी जा रही है, जिसने सीधे तौर पर सीट के जातीय संतुलन को प्रभावित किया है।
स्थानीय राजनीतिक सूत्रों और वार्ड स्तर के आंकड़ों के अनुसार हटे नामों में सर्वाधिक प्रभाव ब्राह्मण मतदाताओं पर पड़ा है। मोहल्ला गंगानगर, पांचाल घाट, गंगापार
इलाके से सटे वार्डों और पुराने शहरी क्षेत्रों में 70 से 75 प्रतिशत तक नाम कटने की चर्चा है। इन इलाकों में बीते 15–20 वर्षों में गंगापार व ग्रामीण क्षेत्रों से आकर बसे परिवारों ने एसआईआर के दौरान अपना वोट गांव में ही सुरक्षित रखा, जिससे शहर की सूची में भारी गिरावट दर्ज हुई।
राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि पूर्व में सदर विधानसभा में ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 18–20 प्रतिशत मानी जाती थी। हालिया कटौती के बाद यह अनुपात घटकर 10–12 प्रतिशत के आसपास आंका जा रहा है। दूसरी ओर ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी, जो पहले लगभग 35–38 प्रतिशत मानी जाती थी, अब बढ़कर 40–45 प्रतिशत के बीच पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है।
इस बदलाव के बाद सदर सीट का चरित्र स्पष्ट रूप से ओबीसी बहुल माना जा रहा है। राजनीतिक दलों के रणनीतिकारों के लिए यह बड़ा संकेत है। टिकट वितरण, उम्मीदवार चयन और चुनावी मुद्दों की प्राथमिकता अब नए जातीय गणित के आधार पर तय हो सकती है।
स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि यह आंकड़े अंतिम सूची में भी बरकरार रहे तो सदर विधानसभा का चुनावी परिणाम पूरी तरह नए समीकरणों पर निर्भर करेगा। परंपरागत वोट बैंक की धारणा कमजोर पड़ती दिख रही है और नए सामाजिक गठजोड़ की संभावनाएं प्रबल हो रही हैं।
हालांकि निर्वाचन विभाग की ओर से अंतिम और अधिकृत आंकड़े जारी होने के बाद ही स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह तय माना जा रहा है कि 1.20 लाख वोट कटने का असर सीधे-सीधे राजनीतिक संतुलन पर पड़ा है।सदर विधानसभा की राजनीति अब पुराने फार्मूलों से नहीं, बल्कि बदले हुए जातीय गणित और नए वोटर प्रोफाइल के आधार पर आगे बढ़ेगी।


