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Wednesday, April 1, 2026

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची पर संग्राम: सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर पर सुनवाई, 47 लाख आपत्तियों का निपटारा

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नई दिल्ली

पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। अदालत को बताया गया कि अब तक कुल 60 लाख आपत्तियों में से 47 लाख का निपटारा किया जा चुका है, जबकि शेष मामलों को भी तेजी से सुलझाने की प्रक्रिया जारी है। इस संबंध में कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया कि प्रतिदिन लगभग 1.75 लाख से 2 लाख आपत्तियों पर कार्रवाई की जा रही है और 7 अप्रैल तक सभी मामलों का निपटारा कर लिया जाएगा।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश पक्ष में ममता बनर्जी के वकील ने अदालत को बताया कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की दर चिंताजनक रूप से अधिक है और यह लगभग 45 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि संबंधित ट्रिब्यूनलों को स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करने दिया जाना चाहिए, ताकि वे निष्पक्ष तरीके से यह तय कर सकें कि किन नामों को सूची में शामिल किया जाए और किन्हें हटाया जाए।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के अनुसार मतदाता सूची में बदलाव की मांग कर सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय निष्पक्ष प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इस संवेदनशील मामले में अगली सुनवाई 7 अप्रैल को निर्धारित की जा सकती है, जो आगे की दिशा तय करने में अहम साबित होगी।
गौरतलब है कि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ी आपत्तियों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के निर्देश दिए थे। साथ ही राज्य के पुलिस महानिदेशक से यह भी पूछा गया था कि एसआईआर अधिकारियों को मिल रही कथित धमकियों के संबंध में क्या कार्रवाई की गई है।
इस पूरे मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ कर रही है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान और गोपाल शंकरनारायनन अदालत में उपस्थित हुए, जबकि चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने पक्ष रखा।
पश्चिम बंगाल में एसआईआर
प्रक्रिया को लेकर जारी यह कानूनी और राजनीतिक घमासान अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है, जहां सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला राज्य की चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची की पारदर्शिता पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

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