भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन आयोग की भूमिका केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है। मतदाता सूची तैयार करने से लेकर मतदान की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे तक, आयोग की हर कार्रवाई सीधे लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ी होती है। ऐसे में आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट स्वाभाविक रूप से गंभीर सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गई है।
द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने-हटाने, अपीलों तथा मतदाता सूची से संबंधित तकनीकी व्यवस्था जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन दावों को अंतिम निष्कर्ष मानने से पहले निर्वाचन आयोग का आधिकारिक पक्ष भी उतनी ही गंभीरता से सामने रखा जाना चाहिए। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार आयोग के सूत्रों ने रिपोर्ट में लगाए गए आंतरिक मतभेद के संकेतों को खारिज करते हुए कहा है कि एसआईआर सहित आयोग के सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए और निर्णयों में सर्वसम्मति थी।
असल सवाल यह नहीं है कि किसी संवैधानिक संस्था के भीतर मतभेद हो सकते हैं या नहीं। संस्थागत विमर्श में असहमति होना असामान्य नहीं है। बड़ा प्रश्न यह है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और महत्वपूर्ण फैसलों का रिकॉर्ड किस तरह संरक्षित और सार्वजनिक किया जाता है।
यदि दो चुनाव आयुक्तों ने वास्तव में कुछ निर्णयों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की हैं, तो उन आपत्तियों का स्वरूप, संबंधित निर्णय, आयोग की प्रतिक्रिया और अंतिम निर्णय की प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना जनता के भरोसे के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, यदि आयोग का कहना है कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए, तो इस दावे और रिपोर्ट में सामने आए दस्तावेजों के बीच अंतर भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था है। किसी पात्र नागरिक का नाम जुड़ना, किसी अपात्र नाम का हटना अथवा किसी मतदाता के नाम को लेकर विवा,इनमें से हर विषय सीधे नागरिक के मतदान अधिकार से जुड़ता है।
इसीलिए मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया में तकनीकी व्यवस्था, स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों की भूमिका, अपील का अधिकार और शिकायतों के निस्तारण की पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में गोवा में कुछ मतदाताओं के नाम दर्ज करने और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से संबंधित अपीलों सहित कई प्रक्रियागत मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। अखिलेश यादव ने भी इसे लोकतंत्र के लिए गंभीर विषय बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय से स्वतः संज्ञान लेने की मांग की है। यह उनका राजनीतिक मत है, जिसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए। दूसरी ओर, आयोग का आधिकारिक पक्ष भी स्पष्ट है कि उसके निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी है कि तथ्य सार्वजनिक हों और संस्थागत प्रक्रिया पर उठे सवालों का दस्तावेजी जवाब मिले।
निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता केवल कानून और संविधान से तय नहीं होती, बल्कि जनता के विश्वास से भी मजबूत होती है। इसलिए आयोग के भीतर निर्णय कैसे लिए जाते हैं, असहमति दर्ज होने पर उसका क्या रिकॉर्ड रहता है और मतदाता सूची में बदलाव के पीछे कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाती है—इन सभी सवालों पर स्पष्टता लोकतांत्रिक संस्थाओं के हित में है।
आज जरूरत किसी संस्था को कटघरे में खड़ा करने या किसी राजनीतिक दल के पक्ष-विपक्ष में निष्कर्ष निकालने की नहीं, बल्कि सवालों के दस्तावेजी जवाब और पूरी पारदर्शिता की है।


