शरद कटियार
डिजिटल युग में लोकप्रियता का पैमाना अब केवल उपलब्धियां, विचार या संघर्ष नहीं रहे। आज एक प्रभावशाली वीडियो, कुछ सेकंड का दृश्य और लाखों लोगों की डिजिटल प्रतिक्रिया किसी भी सामान्य व्यक्ति को रातोंरात देशभर में पहचान दिला सकती है। जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन के दौरान कंटेंट क्रिएटर अभिनव बिष्ट के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। एक वायरल रील ने उन्हें अचानक सोशल मीडिया का चर्चित चेहरा बना दिया और इंटरनेट पर उन्हें “नेशनल क्रश” तथा “Gen Z सेंसेशन” जैसे नामों से पुकारा जाने लगा।
यह घटना केवल एक व्यक्ति के वायरल होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि आज सोशल मीडिया किस तरह जनआंदोलनों, सार्वजनिक विमर्श और व्यक्तिगत पहचान को नई दिशा दे रहा है।
आज भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 90 करोड़ से अधिक हो चुकी है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर प्रतिदिन करोड़ों वीडियो देखे जाते हैं। ऐसे माहौल में यदि कोई वीडियो लोगों की भावनाओं, जिज्ञासा या मनोरंजन से जुड़ जाता है तो वह कुछ घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है। अभिनव बिष्ट की रील के साथ भी यही हुआ। 14.7 करोड़ से अधिक व्यूज केवल एक आंकड़ा नहीं हैं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब किसी भी व्यक्ति को पारंपरिक मीडिया से कहीं अधिक तेजी से राष्ट्रीय पहचान दिला सकते हैं।
लेकिन इस पूरी घटना का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जिस जंतर-मंतर पर हजारों छात्र अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, उसी आंदोलन की चर्चा कई जगह आंदोलन की मांगों से अधिक वायरल वीडियो और सोशल मीडिया स्टारडम के कारण होने लगी। यह आधुनिक डिजिटल संस्कृति का नया स्वरूप है, जहां कई बार मुद्दों की जगह चेहरे और संघर्ष की जगह कंटेंट अधिक चर्चा में आ जाता है।
सोशल मीडिया लोकतंत्र का एक सशक्त माध्यम भी है। पहले जिन आंदोलनों की जानकारी सीमित लोगों तक पहुंचती थी, अब वही घटनाएं कुछ मिनटों में देश-दुनिया तक पहुंच जाती हैं। लाइव वीडियो, रील और व्लॉग ने आम नागरिक को भी सूचना का माध्यम बना दिया है। यही कारण है कि जंतर-मंतर का आंदोलन भी केवल धरना स्थल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मोबाइल स्क्रीन के जरिए करोड़ों लोगों तक पहुंच गया।
हालांकि, डिजिटल लोकप्रियता और वास्तविक सामाजिक प्रभाव में अंतर समझना भी आवश्यक है। किसी व्यक्ति को “नेशनल क्रश” या “Gen Z आइकन” कहना सोशल मीडिया की स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन यह कोई आधिकारिक सम्मान नहीं होता। इंटरनेट पर बनने वाली लोकप्रियता जितनी तेजी से मिलती है, उतनी ही तेजी से समाप्त भी हो सकती है। इसलिए वायरल होने को स्थायी उपलब्धि मान लेना उचित नहीं होगा।
यह भी विचार करने योग्य है कि आज का युवा केवल आंदोलन में भाग नहीं लेता, बल्कि उसे रिकॉर्ड भी करता है, संपादित करता है और दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है। आंदोलन अब केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़े जा रहे हैं। यही कारण है कि किसी भी सार्वजनिक घटना की डिजिटल प्रस्तुति उसके वास्तविक घटनाक्रम जितनी ही प्रभावशाली हो गई है।
अभिनव बिष्ट का वायरल होना इस बदलते दौर की एक मिसाल है। उन्होंने चाहे अनजाने में ही सही, यह दिखा दिया कि आज एक रील भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन सकती है। लेकिन समाज और युवाओं के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम केवल वायरल चेहरों को याद रखेंगे, या उन मुद्दों को भी जिनके बीच से वे चेहरे सामने आए?
डिजिटल युग में लोकप्रियता क्षणिक हो सकती है, लेकिन सामाजिक सरोकार और जनहित के मुद्दे स्थायी होते हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि सोशल मीडिया की शक्ति का उपयोग केवल प्रसिद्धि पाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के महत्वपूर्ण विषयों को जिम्मेदारी के साथ सामने लाने के लिए भी किया जाए। तभी वायरल होने का वास्तविक अर्थ समाज के लिए सकारात्मक बदलाव में बदल सकेगा।
जब आंदोलन से बड़ा हो गया कैमरा, और एक रील ने बदल दी पहचान


