मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस का विरोध अब राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर सड़क पर दिखाई देने लगा है। आगरा में उनके आवास पर कालिख पोते जाने और वाराणसी में पोस्टर पर जूते बरसाए जाने की घटनाओं ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद को एक नया आयाम दे दिया है।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में पारदर्शिता के सवाल उठ रहे हैं। पार्टी इन्हीं मुद्दों को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रही है। वाराणसी में महिला कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा चूड़ियां लेकर प्रदर्शन और आगरा में नारेबाजी इसी राजनीतिक असहमति की अभिव्यक्ति रही।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची से लेकर मतदान और परिणाम तक चुनाव की प्रत्येक प्रक्रिया पर जनता का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है। इसलिए यदि किसी राजनीतिक दल को प्रक्रिया में खामियां नजर आती हैं तो सवाल उठाना, तथ्य सामने रखना और संवैधानिक माध्यमों से जवाब मांगना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है।
लेकिन विरोध का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति के आवास पर कालिख पोतना या उसके पोस्टर को जूतों से पीटना राजनीतिक आक्रोश की तीव्रता तो दिखा सकता है, लेकिन इससे उठाए गए मूल सवालों की गंभीरता कम होने का खतरा भी रहता है। लोकतांत्रिक असहमति की ताकत तर्क, तथ्य और संवैधानिक रास्तों में होती है।
चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोपों और कांग्रेस की आपत्तियों की निष्पक्ष जांच तथा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों के आधार पर चर्चा होना आवश्यक है। इसी के साथ चुनाव आयोग की ओर से भी मतदाता सूची और पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर स्पष्ट और पारदर्शी जानकारी सामने आना जनता के विश्वास को मजबूत कर सकता है।
राजनीति में तीखा विरोध कोई नई बात नहीं है, लेकिन संस्थाओं की गरिमा और लोकतांत्रिक संवाद की मर्यादा बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है। सवाल सत्ता पक्ष से हो या विपक्ष से,उसका आधार तथ्य होना चाहिए और उसका रास्ता संविधान।
आज आवश्यकता आक्रोश को दबाने की नहीं, बल्कि उसे तथ्य और संवाद में बदलने की है। चुनाव व्यवस्था पर जनता का भरोसा किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की साझा पूंजी है।


