(सुभाष आनंद-विनायक फीचर्स)
पंजाब में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक पार्टियों ने योग्य उम्मीदवार तलाशने शुरू कर दिए हैं। सूत्रों के अनुसार प्रत्येक पार्टी की यह कोशिश रहेगी कि जिन उम्मीदवारों को मैदान में उतारा जाना है, उनमें से 50 फीसदी नए चेहरे और 50 फीसदी पुराने चेहरों पर हर पार्टी अपना विश्वास जताए। सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी-अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है।
आम आदमी पार्टी के एक बड़े नेता ने बताया कि पार्टी इस बार पुराने विधायकों पर कम ही भरोसा जताएगी। कई विधायकों की परफॉर्मेंस एवरेज से भी कम आंकी जा रही है। कई विधायकों के खिलाफ पंचायती चुनावों में पैसे लेने की शिकायतें मिल रही हैं। कई विधायकों की अपनी टर्म में बड़ी-बड़ी जायदादें बनाने की शिकायतें भी मिल रही हैं। ऐसे विधायक पार्टी की आंखों में खटक रहे हैं। जिन नेताओं ने अपने जीवन की अंतिम राजनीतिक पारी खेलनी है, वह भी टिकट की दौड़ में रहेंगे।
वहीं आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि 2022 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की लहर थी, जिसके कारण अकाली दल (बादल) और कांग्रेस के धाकड़ नेताओं को भी पराजय का सामना करना पड़ा। पता तो 2027 के चुनावों में लगेगा, आखिर हम कहां खड़े हैं। पार्टी के बड़े नेता उम्मीदवारों का चयन सही करेंगे तो पार्टी पुनः सत्ता में आ सकती है।
उधर, शिरोमणि अकाली दल का विभाजन होने के कारण कई वरिष्ठ अकाली नेता शिरोमणि अकाली दल का दामन छोड़ चुके हैं, इसलिए अकाली दल (बादल) को नए चेहरे तलाशने पड़ेंगे। पुराने अकाली नेता अकाली दल (पुनर्गठन) में चले गए हैं। अकाली दल (बादल) के वरिष्ठ अकाली नेता जनमेजा सिंह सेखों का कहना है कि अकाली दल को जो झटका लगा था, उससे वह उबरकर पुनः अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा है।
सुखबीर सिंह बादल ने अपने पुराने साथियों के छोड़कर चले जाने के पश्चात नए चेहरों के साथ मैदान में उतरना शुरू किया था,वे अपने नये साथियों को स्थापित करने के लिए जोर भी लगा रहे हैं। उसकी उदाहरण फिरोजपुर शहर से सुखपाल सिंह नन्नू हैं, जिन्होंने भाजपा का दामन छोड़कर अकाली दल अपनाया था। परंतु अकाली दल की राह में सबसे बड़ा रोड़ा यह है कि यदि अकाली दल दोफाड़ होकर लड़ा तो वोट बंटने का खतरा है।
भारतीय जनता पार्टी की बात की जाए तो पंजाब में उसका इतना आधार नहीं है। भाजपा बाहरी पार्टियों से आए हुए लोगों के दम पर चुनाव मैदान में उतरेगी। 117 सीटों पर उन्हें उम्मीदवार भी नहीं मिल पाएंगे। 2022 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी अपने बलबूते पर चुनाव लड़ी थी, वह 2 ही सीटें प्राप्त कर सकी थी। भारतीय जनता पार्टी उन जगहों पर भी चुनाव मैदान में उतरेगी, जहां कभी भी उन्होंने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। कांग्रेस के ही नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी के भी कई नेता अब भाजपा में आ चुके है।
अब कांग्रेस की बात करें तो 2027 में कांग्रेस के लिए पंजाब का चुनाव ‘वाटरलू’ साबित होने जा रहा है। पिछले दिनों हरियाणा, दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल में हार के बाद पार्टी वर्कर हतोत्साहित हैं। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष राजा वड़िंग का हाल ही का बयान बड़ा महत्व रखता है कि पंजाब कांग्रेस विधानसभा चुनावों में 60 से 70 फीसदी नए चेहरे उतारने जा रही है। उनके बयान को लेकर पार्टी में असमंजस की स्थिति है, विशेष रूप से पुराने कांग्रेसी नेताओं में जो अपने जीवन की आखिरी राजनीतिक पारी खेल रहे हैं।
कांग्रेस पार्टी के नेता चाहते हैं कि यदि पार्टी उन्हें टिकट नहीं देती तो उनके बच्चों को पार्टी का टिकट दिया जाए, क्योंकि उनके परिवार ने लंबे समय से पार्टी की सेवा की है। कांग्रेस पार्टी चाहती है कि इस चुनाव में 33 फीसदी महिलाओं को टिकट दिए जाएं, ताकि महिला आरक्षण का मुद्दा कवर किया जा सके। पहले कांग्रेस पार्टी विधानसभा के सभी पुराने सदस्यों को टिकट दिए जाने पर राजी हो गई थी, लेकिन अब टिकट बांटने के लिए पूरा सर्वे कराया जा रहा है। माना जा रहा है कि इस बार पार्टी दबाव में टिकटों का वितरण नहीं करेगी।
वहीं कांग्रेस के एक बड़े नेता ने बताया कि पंजाब कांग्रेस में आगामी चुनावों को लेकर बड़ा फेरबदल हो रहा है, यदि पंजाब कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ी तो उसे विपक्ष में बैठना होगा। यदि पंजाब कांग्रेस को सत्ता में आना है तो उसे एकजुट होना होगा। (विनायक फीचर्स)


