अनुराग तिवारी
लोकतंत्र में सत्ता केवल अधिकार का पर्याय नहीं, बल्कि जवाबदेही और अनुशासन की कसौटी भी होती है। जब यही अनुशासन सार्वजनिक मंचों पर बिखरता नजर आए, तो यह केवल एक कार्यक्रम की विफलता नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे पर सवाल खड़े करता है। कन्नौज के रोमा स्मारक पर आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में जो कुछ हुआ, उसने व्यवस्था की इसी कमजोर कड़ी को उजागर कर दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत से पहले ही अव्यवस्था का माहौल बन गया। मुख्य अतिथि समय पर पहुंचे, लेकिन आयोजन पक्ष की तैयारियां नदारद रहीं। हालात ऐसे बने कि लगभग 45 मिनट तक कार्यक्रम शुरू ही नहीं हो सका। यह देरी केवल तकनीकी खामी नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और समन्वय की कमी का स्पष्ट उदाहरण थी।
इस पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बनाता है उत्तर प्रदेश सरकार के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण का हस्तक्षेप। उन्होंने स्वयं जिलाधिकारी को पत्र लिखकर इस अव्यवस्था पर नाराजगी जताई। यह केवल औपचारिक शिकायत नहीं, बल्कि उस तंत्र पर सीधा प्रश्न है, जो जनता के सामने सरकार की छवि प्रस्तुत करता है।
मंत्री ने अपने पत्र में समय की पाबंदी और अनुशासन को प्रशासनिक संस्कृति का मूल बताया। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जब शीर्ष नेतृत्व—जैसे नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ—अपनी कार्यशैली में समयबद्धता और अनुशासन को प्राथमिकता देते हैं, तो जमीनी स्तर पर इसकी अनदेखी गंभीर चिंता का विषय है।
दरअसल, हर सार्वजनिक कार्यक्रम केवल एक आयोजन नहीं होता, बल्कि वह सरकार की कार्यप्रणाली का आईना होता है। जब वहां अव्यवस्था दिखाई देती है, तो उसका सीधा असर जनता के विश्वास पर पड़ता है। यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमारे प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही तय करने की कोई ठोस व्यवस्था है, या फिर ऐसी घटनाएं केवल नाराजगी जताने तक सीमित रह जाएंगी?
यह घटना एक चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि यदि अनुशासन और समयबद्धता को नजरअंदाज किया गया, तो शासन की विश्वसनीयता पर आंच आएगी। और अवसर इसलिए कि इसे सुधार की दिशा में एक मजबूत कदम बनाया जा सकता है।
अब जरूरत है कि इस तरह की घटनाओं को केवल फाइलों और पत्राचार तक सीमित न रखा जाए, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और ठोस सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत केवल नीतियों में नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन में निहित होती है।


