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Wednesday, March 18, 2026
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प्रसाद बिक्रेता दंपति के साथ मारपीट कर व्यापार मंडल नेता ने मांगी रंगदारी, पीड़िता एसपी की शरण में

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प्रसाद देने पर ₹50 का फटा नोट थमाया, विरोध करने पर की गई मारपीट

फर्रुखाबाद। मंदिर पर प्रसाद बेचकर जीवन यापन करने वाली महिला और उसके बीमार पति के साथ मारपीट, अभद्रता और रंगदारी मांगने का गंभीर आरोप शहर के एक व्यापार मंडल नेता पर लगा है। पीड़िता ने पुलिस अधीक्षक को शिकायती पत्र सौंपते हुए कार्रवाई की गुहार लगाई है।

शिकायत के अनुसार, पीड़िता प्रियंका निवासी नवाब दिलावरजंग मोहल्ला, अपने पति गौरव की बीमारी के चलते मंदिर ‘बड़े बूढ़े हनुमान’ के पास प्रसाद बेचकर परिवार का भरण-पोषण करती है। 24 मई को शाम के समय अंकुर श्रीवास्तव निवासी नाला मछरट्टा, शानू तिवारी निवासी बूरा वाली गली, रोहन कश्यप निवासी नगारची मोहल्ला बीबीगंज, विशाल श्रीवास्तव निवासी मदारबाड़ी व अन्य 3-4 लोग मौके पर पहुंचे और प्रसाद मांगा।

पीड़िता के अनुसार, जब उसे ₹50 का प्रसाद दिया गया, तो आरोपित अंकुर श्रीवास्तव ने बदले में ₹50 का फटा हुआ नोट थमा दिया। जब प्रियंका ने वह नोट बदलने को कहा, तो सभी युवक रंगदारी दिखाने लगे और धमकी देने लगे कि यदि दुकान लगानी है तो हर महीने ₹2000 देने होंगे, अन्यथा गाड़ी नहीं लगने दी जाएगी।

जब पीड़िता के पति गौरव ने विरोध करते हुए प्रसाद के पैसे मांगे और गाली देने से मना किया, तो उक्त युवकों ने गौरव के साथ जमकर मारपीट शुरू कर दी। पीड़िता जब अपने पति को बचाने गई तो उसके साथ भी धक्का-मुक्की, मारपीट और अश्लील शब्दों का प्रयोग किया गया। घटना से आहत पीड़िता ने तत्काल थाने जाकर शिकायत की, लेकिन पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न किए जाने का आरोप लगाया। कहा गया कि “अंकुर व्यापार मंडल का नेता है” कहकर उसे टरका दिया गया।

प्रियंका ने आरोप लगाया कि अंकुर श्रीवास्तव एवं उसके साथी गिरोह बनाकर मंदिर क्षेत्र में वसूली का काम करते हैं। दुकानदारों और छोटे व्यापारियों से जबरन रुपये वसूले जाते हैं और विरोध करने पर धमकाया और पीटा जाता है।
पीड़िता ने अब पुलिस अधीक्षक से मिलकर शिकायती पत्र सौंपा है और जनसुनवाई के माध्यम से भी प्रकरण को उठाया है। उसने मांग की है कि दोषियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्यवाही की जाए और उसे व उसके परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए।

वहीं, पूरे प्रकरण को लेकर अभी तक प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। पीड़िता की शिकायत पर क्या कार्रवाई होती है, यह देखना शेष है।

न्यायप्रिय एवं लोकप्रिय शासक थीं रानी अहिल्याबाई होलकर: सत्यपाल सिंह

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रानी अहिल्याबाई होलकर की त्रि-शताब्दी संगोष्ठी को संबोधित करते दुग्ध संघ अध्यक्ष सत्यपाल सिंह

महिलाओं को वितरित किए गए मनरेगा प्रमाण पत्र

फर्रुखाबाद। रानी अहिल्याबाई होलकर त्रि-जन्म शताब्दी स्मृति अभियान के अंतर्गत नवाबगंज विकासखंड में संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें उनके जीवन, विचारों और शासन प्रणाली पर चर्चा की गई। संगोष्ठी के उपरांत स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को मनरेगा प्रमाण पत्र भी वितरित किए गए।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित दुग्ध संघ अध्यक्ष सत्यपाल सिंह ने रानी अहिल्याबाई होलकर को भारतीय इतिहास की महान न्यायप्रिय और जनप्रिय शासक बताते हुए कहा कि उन्होंने मालवा जैसे छोटे से राज्य को सुशासन का आदर्श मॉडल बना दिया। उन्होंने कहा कि केंद्र व प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद ऐसे महापुरुषों और महापुरुषियों के इतिहास को सामने लाया जा रहा है जिनके योगदान को पूर्ववर्ती सरकारों ने उपेक्षित किया।
“अहिल्याबाई होलकर ने महिला सशक्तिकरण का उदाहरण प्रस्तुत किया”

सत्यपाल सिंह ने कहा कि एक महिला होते हुए भी रानी अहिल्याबाई ने अपने शासन काल में जो निष्पक्ष और जनकल्याणकारी कार्य किए, वे आज भी प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि रानी अहिल्याबाई महिला सशक्तिकरण की मिसाल हैं। उन्होंने मंदिरों, धर्मशालाओं, कुओं और सड़कों का निर्माण करवाया और प्रशासनिक दक्षता का ऐसा परिचय दिया जिसे आज भी आदर्श माना जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान केंद्र सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कृतसंकल्प है। 33% आरक्षण से लेकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे अभियानों तक, हर मोर्चे पर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। “ऑपरेशन सिंदूर” में भारतीय महिला सैनिकों ने जो अद्भुत शौर्य दिखाया, वह भारत की शक्ति और महिलाओं के योगदान का प्रमाण है।
सत्यपाल सिंह ने युवाओं से आह्वान किया कि वे रानी अहिल्याबाई के जीवन से प्रेरणा लें और उनके आदर्शों को आत्मसात करें। उन्होंने कहा कि जिस तरह रानी अहिल्याबाई ने न्याय, धर्म और जनसेवा को प्राथमिकता दी, उसी तरह आज की पीढ़ी को भी राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

महिला मोर्चा की क्षेत्रीय उपाध्यक्ष मीरा सिंह ने भी रखे विचार

मीरा सिंह ने कहा कि महिला सशक्तिकरण के बिना सशक्त भारत की कल्पना अधूरी है। रानी अहिल्याबाई होलकर ने तीन सौ वर्ष पहले जो आदर्श प्रस्तुत किया, उसकी गूंज आज भी भारत के प्रशासनिक ढांचे में महसूस की जा सकती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महिलाएं प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और भारत की सामाजिक संरचना को मजबूती दे रही हैं।

इस अवसर पर नवाबगंज मंडल अध्यक्ष कमल भारद्वाज, एडीओ सुखदेव सिंह, मंडल महामंत्री प्रशांत मिश्रा, मंडल उपाध्यक्ष मुकेश दुबे, योगेंद्र सिंह राठौर, आदेश राठौर सहित अनेक भाजपा कार्यकर्ता, ग्रामीण महिलाएं व अधिकारीगण उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के समापन पर स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को मनरेगा योजना के तहत प्रमाण पत्र वितरित किए गए, जिससे उन्हें भविष्य में सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में सहूलियत होगी।

30 मई को मनाया जाएगा हिंदी पत्रकारिता दिवस

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– उदंत मार्तंड की स्मृति में मनाया जाता है यह दिन, आयोजनों की तैयारी नहीं

फर्रुखाबाद। हिंदी भाषा और पत्रकारिता के गौरवमयी इतिहास को स्मरण कराने वाला हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई को मनाया जाएगा। यह दिन हिंदी पत्रकारिता की नींव रखने वाले पहले समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ की स्मृति में प्रतिवर्ष मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत 30 मई 1826 को कोलकाता से हुई थी।

हालांकि, शुक्रवार को पड़ने वाले इस महत्वपूर्ण दिवस को लेकर अब तक जिले के किसी भी पत्रकार संगठन द्वारा आयोजन या कार्यक्रम की औपचारिक सूचना नहीं दी गई है, जिससे पत्रकारों में मायूसी देखी जा रही है। आमतौर पर इस दिन गोष्ठियों, संगोष्ठियों, सम्मान समारोहों एवं विचार विमर्श के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिसमें हिंदी पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप, चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर चर्चा होती है।

‘उदंत मार्तंड’ के संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल थे, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता का जनक माना जाता है। यह साप्ताहिक अखबार कोलकाता से प्रकाशित होता था, और यहीं से हिंदी पत्रकारिता का आधुनिक इतिहास आरंभ हुआ। यह दिन केवल एक पत्र की शुरुआत नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के स्वाभिमान, स्वतंत्रता और संघर्ष का प्रतीक भी है।

स्थानीय पत्रकारों ने अपेक्षा जताई है कि पत्रकार संगठनों को इस दिन को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि हिंदी भाषा और पत्रकारिता की गरिमा के प्रतीक दिवस के रूप में मनाना चाहिए। पत्रकारिता जगत की वर्तमान परिस्थितियों, चुनौतियों और क्षेत्रीय पत्रकारों की समस्याओं पर संवाद आवश्यक है।

वर्तमान डिजिटल युग में जब पत्रकारिता की दिशा और दशा पर नए सवाल खड़े हो रहे हैं, तब हिंदी पत्रकारिता दिवस पत्रकारों को आत्ममंथन और एकजुटता का अवसर देता है। स्थानीय पत्रकारों ने उम्मीद जताई कि जिला स्तर पर कोई आयोजन हो, जिससे हिंदी पत्रकारिता की गरिमा और पत्रकारों का मनोबल दोनों बढ़े।

जहरीले कीड़े के काटने से युवती की दर्दनाक मौत, परिवार में मचा कोहराम

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चाय पीते समय बिगड़ी तबीयत, लोहिया अस्पताल ले जाते समय तोड़ा दम

कमालगंज (फर्रुखाबाद)। थाना क्षेत्र के ग्राम भूढ़ नगला में एक दर्दनाक हादसे ने पूरे गांव को गमगीन कर दिया। जहरीले कीड़े के काटने से एक 16 वर्षीय किशोरी की मौत हो गई। मृतका शिल्पी अपने पिता स्व. रामगोपाल की तीसरी संतान थी और नौवीं कक्षा की छात्रा थी।

परिजनों के अनुसार बीती रात शिल्पी को किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया था। जब उसने यह बात अपनी मां सरोजनी देवी और भाई अर्जुन को बताई तो सभी ने इसे मामूली बात समझकर नजरअंदाज कर दिया और सो गए। सुबह रोज की तरह सभी अपने कार्यों में लग गए। तभी करीब 10 बजे शिल्पी ने चाय पीते समय अचानक तबीयत खराब होने की बात कही। यह सुनते ही परिवार के लोग घबरा गए और उसे तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कमालगंज ले जाया गया।
स्वास्थ्य केंद्र में उपचार के दौरान उसकी हालत और बिगड़ती चली गई, जिसे देखते हुए डॉक्टरों ने उसे लोहिया अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रास्ते में ही शिल्पी ने दम तोड़ दिया।
शिल्पी की मौत की खबर जैसे ही गांव में फैली, पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। मां सरोजनी देवी और भाई अर्जुन का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। परिवार में पहले ही पिता की मृत्यु हो चुकी है, ऐसे में शिल्पी की असमय मौत ने सभी को झकझोर कर रख दिया।
सूचना पर कमालगंज पुलिस मौके पर पहुंची और शव का पंचनामा भर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पुलिस मामले की जांच में जुटी है।

गांव में मातम का माहौल, स्कूल के साथी भी पहुंचे अंतिम दर्शन को

घटना के बाद शिल्पी के स्कूल के साथी और शिक्षक भी उसे अंतिम विदाई देने पहुंचे। सभी की आंखें नम थीं और गांव का माहौल पूरी तरह शोक में डूबा रहा।

“मूल्यांकन का समय: इंटर्न डॉक्टरों की मांगें और सरकार की ज़िम्मेदारी”

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Sharad Katiyar
Sharad Katiyar

शरद कटियार

भारत (India) की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले डॉक्टरों के प्रशिक्षण की अंतिम कड़ी होती है – इंटर्नशिप। यह वह समय होता है जब एक एमबीबीएस छात्र (MBBS student) चिकित्सा विज्ञान (medical science) के सैद्धांतिक ज्ञान को व्यवहार में उतारता है, जीवन-मरण से जुड़ी चुनौतियों का प्रत्यक्ष सामना करता है और अपने कौशल को मरीजों की सेवा में झोंक देता है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में, जहां चिकित्सा सुविधाओं का दबाव पहले से ही अत्यधिक है, वहां इंटर्न डॉक्टरों की भूमिका और भी अहम हो जाती है। ऐसे में यदि उन्हें उचित पारिश्रमिक न मिले, तो यह न केवल उनके आत्मसम्मान पर चोट है, बल्कि एक असंवेदनशील प्रणाली की गवाही भी है।

उत्तर प्रदेश के इंटर्न डॉक्टरों ने हाल ही में अपने मानदेय में वृद्धि की मांग को लेकर आवाज बुलंद की है। केजीएमयू, लोहिया संस्थान, सैफई विश्वविद्यालय, जिम्स ग्रेटर नोएडा समेत राज्य के कई संस्थानों के इंटर्न डॉक्टरों ने स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखते हुए अपने हालात का जिक्र किया है। यह पत्र सिर्फ आर्थिक मांग नहीं है, यह उस भावनात्मक और सामाजिक संघर्ष का दस्तावेज़ है, जिसे ये नवयुवक डॉक्टर झेल रहे हैं।

वर्तमान परिदृश्य:

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में इंटर्न डॉक्टरों को मात्र 12,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जा रहा है। यह राशि न केवल अपर्याप्त है, बल्कि अन्य राज्यों की तुलना में भी बहुत कम है। ऐसे में यूपी का 12,000 रुपये का आंकड़ा बेहद अपमानजनक प्रतीत होता है, विशेषकर तब जब इन्हीं डॉक्टरों से 24×7 सेवाएं ली जा रही हों – ओपीडी, ऑपरेशन थियेटर, आईसीयू, इमरजेंसी, लेबर रूम और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में। इंटर्न डॉक्टर न केवल मरीजों के इलाज में मदद करते हैं, बल्कि कई बार डॉक्टरों की अनुपस्थिति में प्राथमिक उपचार का जिम्मा भी उठाते हैं। फिर भी, उन्हें न्यूनतम पारिश्रमिक तक नहीं दिया जाना प्रशासनिक असंवेदनशीलता का उदाहरण है।

आज के समय में 12,000 रुपये में एक युवा डॉक्टर कैसे अपना जीवन यापन करे – यह एक यक्ष प्रश्न है। मेडिकल इंटर्न के सामने निम्नलिखित खर्चे अनिवार्य हैं: मेडिकल कॉलेजों के अधिकांश छात्र छात्राएं अपने घरों से दूर रहते हैं। हॉस्टल शुल्क, मेस खर्च, या किराए के कमरों का भाड़ा उन्हें खुद ही उठाना होता है। अस्पताल और हॉस्टल के बीच दूरी, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में, परिवहन लागत को बढ़ाती है। अधिकांश इंटर्न डॉक्टर पोस्ट-ग्रेजुएशन (PG) की तैयारी कर रहे होते हैं, जिसके लिए कोचिंग संस्थानों की फीस और परीक्षा शुल्क वहन करना पड़ता है।यह जीवन का वह दौर होता है जब परिवार भी अपेक्षाएं रखता है।

यदि युवा को किसी आकस्मिक परिस्थिति में पैसा चाहिए, तो वर्तमान मानदेय किसी प्रकार की आपात स्थिति में सहायक नहीं होता। आर्थिक तंगी केवल जेब खाली नहीं करती, आत्मबल भी तोड़ देती है। यह डॉक्टर जब ऑपरेशन थियेटर में एक वरिष्ठ सर्जन की मदद कर रहे होते हैं, ICU में मरीजों की जान बचा रहे होते हैं या ग्रामीण क्षेत्र में एकमात्र उपलब्ध चिकित्सा सहयोगी बनते हैं, तब उनकी पीठ थपथपाने के बजाय उन्हें उपेक्षा की चादर ओढ़ा दी जाती है।

मानदेय की यह स्थिति न केवल उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। सामाजिक मंचों पर अक्सर ‘डॉक्टर को भगवान का दर्जा’ दिया जाता है, लेकिन वही डॉक्टर जब अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए सरकार से गुहार लगाए, तो यह समाज की दोहरी मानसिकता को भी उजागर करता है।

उत्तर प्रदेश सरकार, विशेषकर उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक, स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण और विस्तार की बातें बार-बार करते हैं। लेकिन जब इन सेवाओं की नींव रखने वाले इंटर्न डॉक्टरों को पर्याप्त मानदेय नहीं दिया जाता, तो यह नीति और नीयत के बीच के अंतर को दर्शाता है।

वित्तीय संसाधनों की बात करना एक सामान्य बहाना बन गया है। जब सरकारें अन्य राज्य योजनाओं पर करोड़ों खर्च कर सकती हैं, इवेंट्स और प्रचार पर अरबों रुपये बहा सकती हैं, तब इन युवाओं की वाजिब मांगों को नज़रअंदाज़ करना पूरी तरह से अनुचित है।

यदि इंटर्न डॉक्टरों की मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले समय में कई गंभीर स्थितियों से जूझना पड़ सकता है: इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन का सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा, विशेषकर ग्रामीण व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर।उत्तर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों की छवि राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित होगी। छात्र दूसरे राज्यों के मेडिकल कॉलेजों को प्राथमिकता देने लगेंगे।

प्रतिभाशाली डॉक्टर अपनी सेवाएं उन राज्यों या संस्थानों में देना पसंद करेंगे जहां उन्हें पेशेवर सम्मान और वित्तीय सुरक्षा मिले।कर्नाटक, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने न केवल इंटर्न डॉक्टरों का मानदेय बढ़ाया है, बल्कि उन्हें समय-समय पर आवश्यक सुविधाएं भी दी हैं। वहां की सरकारों ने यह समझा है कि डॉक्टरों में निवेश, स्वास्थ्य व्यवस्था में दीर्घकालिक सुधार लाता है। यूपी को भी यह सीखना होगा।

यह समय है कि केंद्र सरकार इस विषय पर राष्ट्रीय मानक तय करे। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण की समानता आवश्यक है। इंटर्नशिप मानदेय के लिए न्यूनतम राष्ट्रीय मानक निर्धारित करने की जरूरत है ताकि सभी राज्यों में इंटर्न डॉक्टरों को एक समान पारिश्रमिक और सम्मान मिले। इंटर्न डॉक्टरों की यह मांग केवल पैसे की नहीं है, यह सम्मान, न्याय और मानवीय गरिमा की मांग है। यह युवा डॉक्टर हमारे स्वास्थ्य भविष्य की बुनियाद हैं। उन्हें मजबूत बनाना, उनका मनोबल बढ़ाना और उनके श्रम का समुचित मूल्य देना सरकार का कर्तव्य है।

स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री से यह अपेक्षा है कि वे इस विषय को संवेदनशीलता से लें, महज़ तकनीकी और वित्तीय दृष्टिकोण से नहीं। इन डॉक्टरों की आवाज़ को आंदोलन बनने से पहले सुना जाए, क्योंकि यदि इनकी सेवा भावना टूट गई तो आने वाले समय में स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ दरक जाएगी। उत्तर प्रदेश की सरकार के पास अभी भी समय है – वो इस मांग को अवसर में बदले, और यह साबित करे कि वह अपने स्वास्थ्य सेवकों के साथ है, केवल भाषणों में नहीं, बल्कि नीतियों में भी।

शरद कटियार

प्रधान संपादक, दैनिक यूथ इंडिया

बिजली विभाग के जेई पर रिश्वतखोरी का आरोप, वायरल ऑडियो से मचा हड़कंप

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ग्रामीण का आरोप – पहले भी ले चुका 60 हजार, अब 10 हजार की फिर से मांग

नवाबगंज (फर्रुखाबाद)। बिजली विभाग के एक जूनियर इंजीनियर (जेई) की रिश्वतखोरी की करतूत का ऑडियो वायरल होने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। यह मामला नवाबगंज ब्लॉक के बिजली उपकेंद्र से जुड़ा हुआ है, जहां तैनात जेई राम जनक पर एक ग्रामीण से 10 हजार रुपये की रिश्वत मांगने का गंभीर आरोप लगा है।

बताया जा रहा है कि वायरल ऑडियो में जेई और ग्रामीण के बीच बातचीत दर्ज है, जिसमें जेई साफ-साफ रुपये की मांग करता सुना जा सकता है। ग्रामीण ने दावा किया कि जेई पहले भी उससे करीब 60 हजार रुपये की रिश्वत ले चुका है। अब फिर से 7 लाख रुपये के बकाया बिजली बिल को लेकर जेई ने 10 हजार रुपये की मांग की है।

ग्रामीण का आरोप है कि जब उसने रुपये देने में असमर्थता जताई, तो जेई ने कटौती की धमकी दी और विभागीय कार्रवाई कराने की बात कही। इस पूरी बातचीत का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिससे बिजली विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि नवाबगंज ब्लॉक के कई गांवों में बिजली विभाग के कर्मचारी अवैध वसूली कर रहे हैं, जिससे न केवल आम जनता परेशान है, बल्कि राजस्व को भी नुकसान हो रहा है।

ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित जेई राम जनक के खिलाफ जांच कर कठोर कार्रवाई की जाए और रिश्वतखोरी की इस प्रणाली को रोका जाए।

मामले के तूल पकड़ने के बाद भी बिजली विभाग के उच्च अधिकारी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। जब इस संबंध में एक्सईएन से बात करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

ग्रामीण का कहना है, “मैं पहले ही आर्थिक तंगी से जूझ रहा हूं। जेई ने 60 हजार रुपये पहले भी ले लिए थे। अब फिर से दस हजार मांग रहा है। मैंने मना किया, तो धमकी दे दी। मुझे मजबूर होकर ऑडियो रिकॉर्ड करना पड़ा ताकि सच सामने लाया जा सके।”