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Wednesday, March 18, 2026
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फर्जी वर्दी में पीआरडी जवान! फर्रुखाबाद में धड़ल्ले से हो रही अवैध प्राइवेट ड्यूटी

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फर्रुखाबाद। पीआरडी (प्रांतीय रक्षक दल) जवानों की फर्जी तैनाती का बड़ा मामला सामने आया है। जांच में खुलासा हुआ है कि दर्जनों पीआरडी जवान बिना किसी आधिकारिक अनुमति के डॉक्टरों और निजी व्यक्तियों के यहां प्राइवेट ड्यूटी कर रहे हैं। इन जवानों ने फर्जी वर्दी पहन रखी है, जिससे आम जनता को भ्रम हो रहा है कि ये सरकारी कार्य में लगे हैं, जबकि सच्चाई कुछ और है।

सूत्रों से हुई पड़ताल में डॉ. जितेंद्र यादव के पास नौ जवान,डॉ. नागेंद्र सिंह के पास दो जवान, डॉ. शैलेंद्र सिंह के पास दो जवान,डॉ. पुष्पेंद्र सिंह के पास चार जवान, विजय यादव निजी व्यक्ति के पास चार जवान,अजय पाल (निजी व्यक्ति) के पास छह जवान श्याम पाल (निजी व्यक्ति) के पास दो जवान तैनात है।

इन सभी पीआरडी जवानों के पास कोई आधिकारिक आदेश या तैनाती पत्र नहीं है, और ये बिना जिला प्रशासन की जानकारी के निजी कार्यों में लगे हैं।

यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि आखिर इतनी संख्या में फर्जी तैनाती किसकी अनुमति से हो रही है? क्या इसमें स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत है? क्या वर्दीधारी जवान खुद इस खेल का हिस्सा हैं? वर्दीधारी जवानों को देख आम जनता उन्हें सरकारी ड्यूटी में लगा समझ बैठती है, जिससे कई बार भ्रम की स्थिति बन जाती है। ऐसे में फर्जी जवानों की उपस्थिति समाज और सुरक्षा व्यवस्था दोनों के लिए खतरे की घंटी है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार यह केवल एक हिस्से की जानकारी है, पूरे जनपद में कई अन्य स्थानों पर भी इसी प्रकार से फर्जी पीआरडी जवानों की तैनाती हो सकती है। अब मामला जिला प्रशासन तक पहुँच चुका है और जांच की मांग उठ रही है। जल्द ही इस पर उच्चस्तरीय कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।

जिले में पीआरडी जवानों की फर्जी तैनाती का मामला प्रशासनिक तंत्र और सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान है। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो यह प्रवृत्ति और अधिक फैल सकती है। ज़रूरत है पारदर्शी जांच और सख्त कार्यवाही की, ताकि सरकारी वर्दी की गरिमा बनी रहे।

जब व्यवस्था खुद चोर बन जाए, तो ईमानदार सिर्फ बलि के बकरे बनते हैं!

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लखनऊ। देश की सबसे बड़ी सरकारी उर्वरक कंपनियों में शामिल हिन्दुस्तान उर्वरक रसायन लिमिटेड, आज गलत वजहों से सुर्खियों में है। जिस संस्थान से देश के किसानों को खाद मुहैया कराने की उम्मीद थी, उसी में अब अरबों की बंदरबांट और घोटालों की बू आ रही है। अफ़सरों ने मानो इस संस्थान को अपनी जागीर बना लिया है, और जब जवाबदेही की बात आती है, तो बलि का बकरा बनाया जाता है सिर्फ निचले दर्जे के कर्मचारियों को।

एचयूआरएल से जुड़े सूत्रों के अनुसार, टॉप मैनेजमेंट स्तर पर टेंडर सेटिंग, सप्लायर अप्रूवल और फंड रिलीज़ जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं पहले से ही तय होती हैं। इसमें नियमों की अनदेखी कर कुछ खास कंपनियों को ठेके दिए जाते हैं और बदले में मोटी रकम की वसूली की जाती है। लेकिन जैसे ही जांच शुरू होती है, पहला वार उन कर्मचारियों पर होता है जिनकी भूमिका महज़ दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने की होती है।

कई कर्मचारियों को निलंबन, अनुशासनात्मक कार्रवाई या जबरन इस्तीफे का सामना करना पड़ा, जबकि वे सिर्फ ऊपरी आदेशों का पालन कर रहे थे।

जिन अफसरों के इशारे पर ये तमाम प्रक्रियाएं चलती हैं, वे एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठकर मुस्कुराते रहते हैं और उनका नाम तक जांच के दायरे में नहीं आता।

कई कर्मचारियों का कहना है कि संस्थान के अंदर डर और निराशा का माहौल है। कर्मचारियों को यह आशंका सताने लगी है कि ईमानदारी और निष्ठा अब इस सिस्टम में सबसे बड़ा अपराध बन चुकी है। आज किसी भी निर्दोष को बिना गलती के ही बलि चढ़ाया जा सकता है, और वह भी सिर्फ इसीलिए कि वह सबसे आसान निशाना है।

इस स्थिति में सवाल उठता है कि जब पूरे सिस्टम की जड़ें ही सड़ चुकी हों, तो किसी एक जांच या कार्रवाई से क्या सुधार हो सकता है? क्या वाकई इस देश में ‘गुड गवर्नेंस’ का सपना इन घोटालों की आँच से बचा रह सकता है?

सरकारी तंत्र में बैठे बड़े लोगों की मिलीभगत की वजह से असली गुनहगार हर बार बच निकलते हैं। निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी, जो सच्चाई के सबसे करीब होते हैं, उन्हें ही हर बार कुर्बानी देनी पड़ती है।

(अगले अंक में: HURL के टॉप मैनेजमेंट में बैठे उन चेहरों की परतें खोलेंगे जिन पर करोड़ों की हेराफेरी, पद के दुरुपयोग और नेटवर्किंग के ज़रिए जांच से बच निकलने के गंभीर आरोप हैं।)

जब मौत बिकने लगे—स्वास्थ्य विभाग की शह पर फलते-फूलते अवैध अस्पताल

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भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में निजी अस्पतालों की भूमिका बहुत बड़ी मानी जाती है। लेकिन जब यह भूमिका मानवीय संवेदनाओं से परे होकर सिर्फ लालच की गली में भटकने लगे, तो न सिर्फ चिकित्सा-सेवा बदनाम होती है बल्कि इंसानियत भी शर्मसार होती है। फर्रुखाबाद के कायमगंज में न्यू परी हॉस्पिटल में प्रसव के बाद एक जच्चा-बच्चा की मौत इसी शर्मनाक हकीकत की ताजा मिसाल है। सवाल उठता है कि क्या यह मौत एक चिकित्सकीय दुर्घटना थी या फिर सुनियोजित लापरवाही का नतीजा? और यदि यह लापरवाही है, तो इसका जिम्मेदार कौन है—अस्पताल संचालक? स्वास्थ्य विभाग? या वह पूरी व्यवस्था जो ऐसे ‘गोरखधंधों’ को आंख मूंद कर संरक्षण देती है?

बरखेड़ा गांव निवासी ब्रजकिशोर की पत्नी राखी को 28 मई को प्रसव पीड़ा हुई। उसे कायमगंज के न्यू परी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज के नाम पर परिजनों से 25 हजार रुपए ऐंठे गए। कुछ घंटों के भीतर ही राखी और उसका नवजात बच्चा दोनों इस दुनिया से विदा हो गए। अस्पताल प्रशासन न सिर्फ इलाज में विफल रहा, बल्कि घटना के बाद संचालक पुष्पेंद्र शाक्य समेत पूरा स्टाफ अस्पताल से फरार हो गया। क्या ये किसी सजग स्वास्थ्य प्रणाली की तस्वीर हो सकती है?

यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी इसी अस्पताल में दो बार ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, और हर बार खानापूर्ति के नाम पर अस्पताल सील कर दिया गया, फिर कुछ महीनों बाद वही अस्पताल दोबारा खुलेआम चलने लगा। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में यह गोरखधंधा फल-फूल रहा है?

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि न्यू परी हॉस्पिटल जैसी अवैध संस्थाएं स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और मिलीभगत की देन हैं। इस अस्पताल में न तो मानक ऑपरेशन थिएटर था, न प्रशिक्षित स्टाफ, और न ही कोई लाइसेंस से जुड़ी पारदर्शिता। बावजूद इसके, यह वर्षों से ‘प्रसव केंद्र’ के रूप में काम कर रहा था। सवाल उठता है—क्या स्वास्थ्य विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी? यदि थी, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी नहीं थी, तो यह और भी शर्मनाक है कि ऐसे ‘मौत के अस्पताल’ विभाग की नाक के नीचे बेधड़क चलते हैं।

जो अस्पताल महज चार कमरों में संचालित हो रहा हो, जिसमें एक छोटा सा मेडिकल स्टोर और मामूली सुविधा वाला ऑपरेशन थिएटर हो, क्या वह किसी भी प्रकार से गंभीर इलाज या प्रसव जैसी जटिल प्रक्रिया के लिए उपयुक्त माना जा सकता है।

इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका संतुलित कही जा सकती है। मौके पर पहुंची मंडी चौकी व कस्बा चौकी की टीम ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा और प्रारंभिक जांच की। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या सिर्फ पंचनामा भर देने से इंसाफ हो जाएगा? क्या इस मामले में अस्पताल संचालक पर गैर इरादतन हत्या जैसी धाराओं में मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया जाएगा? या फिर यह मामला भी अन्य घटनाओं की तरह कुछ दिन सुर्खियों में रहने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

प्रसूता राखी और उसके नवजात की मौत के बाद परिजनों ने छह घंटे तक न्यू परी हॉस्पिटल के बाहर हंगामा किया। लेकिन अस्पताल प्रशासन का कोई व्यक्ति पीड़ित परिवार से न मिला, न संवेदना जताई। यह अमानवीयता की पराकाष्ठा है। परिजनों की पीड़ा यह नहीं थी कि उन्हें सिर्फ अपने परिजनों की मौत का दुख था, बल्कि उन्हें यह भी कचोट रहा था कि यह मौत रोकी जा सकती थी—अगर अस्पताल में मानक सुविधा होती, प्रशिक्षित स्टाफ होता, और मरीजों से पैसा कमाने की जगह सेवा देने का भाव होता।

कायमगंज जैसे छोटे शहरों में न्यू परी हॉस्पिटल जैसे सैकड़ों ‘मौत के अस्पताल’ सक्रिय हैं, जो न किसी मानक पर खरे उतरते हैं और न ही किसी व्यवस्था की पकड़ में आते हैं। इनमें से अधिकतर अस्पताल केवल दिखावे के लिए चलते हैं, लेकिन अंदर से वे एक शोषण का अड्डा हैं, जहां पैसे के बदले जिंदगी की गारंटी नहीं दी जाती।

स्वास्थ्य विभाग के पास हर अस्पताल का पंजीकरण, लाइसेंसिंग और निरीक्षण का अधिकार है। फिर क्या वजह है कि फर्रुखाबाद जैसे जिले में ऐसे ‘अवैध अस्पताल’ खुलेआम कार्यरत हैं?

निजी अस्पतालों की मनमानी और लापरवाही को रोकने के लिए जरूरी है कि, हर निजी अस्पताल का साल में दो बार अनिवार्य निरीक्षण हो।लाइसेंस केवल सुविधा और स्टाफ की शुद्ध जांच के बाद ही जारी किए जाएं। पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए कोर्ट का हस्तक्षेप हो। लापरवाह और झोलाछाप डॉक्टरों पर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। लोगों को सिखाया जाए कि मान्यता प्राप्त अस्पताल और डॉक्टर की पहचान कैसे करें।

एक लोकतांत्रिक और संवेदनशील राष्ट्र की परिभाषा तब पूरी होती है जब वहाँ सबसे गरीब नागरिक की जान भी उतनी ही कीमती मानी जाती है जितनी किसी अमीर या रसूखदार की। लेकिन जब अस्पताल पैसे के लिए इंसानों की जान से खिलवाड़ करने लगें, जब स्वास्थ्य विभाग चुप्पी साध ले, और जब प्रशासन केवल पंचनामा और सील करने की रस्म अदायगी करे—तो ये संकेत हैं कि व्यवस्था बीमार है।

राखी और उसके नवजात की मौत सिर्फ एक दुखद घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक व प्रशासनिक विफलता है। यह उस सड़ांध की कहानी है जो हमारी स्वास्थ्य प्रणाली में घर कर चुकी है। अब समय है कि ऐसी घटनाओं को सिर्फ खबर बनाकर छोड़ने की बजाय, इन्हें बदलाव का आधार बनाया जाए। वरना कल फिर कोई और राखी, किसी और परी हॉस्पिटल में मौत की गोद में चली जाएगी—और हम फिर सिर्फ आंसू बहाने और रिपोर्ट लिखने तक सीमित रह जाएंगे।

मौत का हॉस्पिटल! फिर निजी अस्पताल ने ली जच्चा बच्चा की जान

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  • आखिर किसकी शय पर चल रहा गोरख धंधा?

कायमगंज फर्रुखाबाद।  खबर जनपद फर्रुखाबाद से है जहां परी हॉस्पिटल में प्रसव के बाद जच्चा व बच्चा की मौत हो गई। जच्चा व बच्चा की मौत की सूचना पर अस्पताल संचालक व स्टाफ अस्पताल छोड़कर फरार हो गया। परिजनों ने कार्रवाई की मांग करते हुए जमकर हंगामा काटा वहीं सूचना पर पहुंची पुलिस ने शवों का पंचनामा भर पोस्टमार्टम के लिए भेजे।

जनपद फर्रुखाबाद के कायमगंज नगर के पुलिया पुल गालिब के पीछे स्थित न्यू परी अस्पताल ने फिर एक बार दो मासूमों की जिंदगी लिगल ली। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि प्रसव के बाद जच्चा व बच्चा की मौत हुई हो। इससे पहले भी दो बार इस अस्पताल में ऐसी घटनाएं हो चुकी है। जिसके बाद खाना पूर्ति के लिए तो यह अस्पताल स्वास्थ्य विभाग के द्वारा तो सील कर दिया गया। लेकिन स्वास्थ्य विभाग में बैठे आला अधिकारियों से साथ सांठ गांठ के चलते यह अस्पताल बार-बार चालू होता रहा।

स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी से जिले में न जाने ऐसे कितने अवैध निजी अस्पताल है जो आए दिन किसी न किसी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं।लेकिन स्वास्थ्य विभाग चंद पैसों की खातिर केवल मूक दर्शक बना रहता है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि इंसान की जान की कीमत चंद नोटों की गड्डियां है।

क्या है पूरा मामला

मंगलवार की सुबह कंपिल थाना क्षेत्र के गांव बरखेड़ा निवासी ब्रजकिशोर की पत्नी राखी को प्रसव पीड़ा हुई। परिजनों ने रीना लगभग 10 बजे न्यू परी हॉस्पिटल पुल गलिब कायमगंज में भर्ती कराया।जिसके बाद अस्पताल में मौजूद कर्मचारियों ने प्रसव के लिए 20 हजार रुपए नकद,5 हजार रुपए ऑनलाइन ट्रांसफर कराए। थोड़ी देर बाद अस्पताल के कर्मचारियों ने परिजनों से 6 हजार रुपए ब्लड के लिए व 200 रुपए जांच के लिए।अस्पताल में राखी ने नवजात को जन्म दिया हालत बिगड़ने पर अस्पताल संचालक पुष्पेंद्र शाक्य उसे किसी वाहन से फर्रुखाबाद के निजी अस्पताल में ले गया। जहां डॉक्टर ने प्रसूता व नवजात दोनों को मृत घोषित कर दिया। जच्चा बच्चा की मौत की खबर सुनते ही अस्पताल संचालक पुष्पेंद्र शाक्य मौके से फरार हो गया। गुस्साए परिजन प्रसूता व नवजात के शव को वापस न्यू परी हॉस्पिटल ले आए।

परिजनों ने काटा हंगामा

प्रसूता राखी व नवजात की मौत के बाद गुस्सा आए परिजनों ने जमकर हंगामा काटा। हंगामे को देखते हुए अस्पताल में मौजूद कर्मचारी धीरे से मौका देखकर नौ दो ग्यारह हो गए। अस्पताल संचालक के खिलाफ कार्यवाही की मांग करते हुए पर जिन्होंने लगभग 6 घंटे तक हंगामा किया। लेकिन अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई भी व्यक्ति पीड़ित परिजनों से मुलाकात या बातचीत करने तक नहीं आया। ऐसे में कहां जा सकता है कि निजी अस्पताल के संचालक व कर्मचारी मानवीय संवेदनाओं से परे हैं। उन्हें केवल चंद पैसों से मतलब है। जांच करने पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम प्रसूता पर नवजात की मौत की सूचना जिले में आग की तरह फैल गई।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी के निर्देश पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कायमगंज के अधीक्षक डॉक्टर शोभित, डॉ विपिन व डॉक्टर अमरेश के साथ न्यू परी हॉस्पिटल पहुंचे।जहां उन्होंने जांच पड़ताल की जांच पड़ताल के दौरान अस्पताल के एक कोने में उन्हें मेडिकल स्टोर संचालित मिला।वही 10 बाई 10 एक छोटा था ऑपरेशन थिएटर मिला जिसे स्वास्थ्य विभाग की टीम ने सील कर दिया।

अब देखना यह होगा कि आखिर कब तक यह अस्पताल सील रहेगा या फिर स्वास्थ्य विभाग की छत्रछाया में यह अस्पताल दोबारा खुलेगा। और ऐसे झोलाछाप डॉक्टर कब तक लोगो की जिंदगियों से खेलते रहेंगे।

सूचना पर पहुंची पुलिस

आपको बता दे की प्रसूता व नवजात की मौत की सूचना पर मंडी चौकी प्रभारी अवधेश कुमार कस्बा चौकी प्रभारी नागेंद्र सिंह एसआई सुधा सिंह फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे जहां उन्होंने जांच पड़ताल कर प्रसूता व नवजात का शव का पंचनामा भर पोस्टमार्टम के लिए भेजे। आपको बता दे की पीड़ित परिजन पुलिस के सामने भी अस्पताल संचालक के विरुद्ध कार्रवाई की मांग करते रहे।

आपको बता दे कि न्यू परी हॉस्पिटल केवल चार कमरों में संचालित है। जिसमें एक कमरा अस्पताल संचालक पुष्पेंद्र शाक्य के बैठने के लिए है वही उसके बगल में दूसरा कमरा जिसमें दो बेड पड़े हैं जो कि लगभग 10 बाय 10 का होगा वहीं तीसरा कमरे को ऑपरेशन थिएटर बना रखा है। ऑपरेशन थिएटर के बगल में एक और कमरा मौजूद है। वही जब आप अस्पताल में दाखिल होंगे तो दाएं तरफ एक छोटा सा मेडिकल स्टोर उसके बगल में एक कुर्सी मेज है जिस पर रिसेप्शनिस्ट या वहां पर काम करने वाले कर्मचारी बैठते है।

कायमगंज में फल फूल रहे कई ऐसे अवैध अस्पताल। स्वास्थ्य विभाग को जानना चाहिए कि क्या यह अस्पताल मानकों पर खरा उतरता है?

राठौरा में मनरेगा में बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर, एक फोटो से 42 फर्जी लेबर जिओ टैगिंग

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 फर्रुखाबाद। ग्राम पंचायत राठौरा, जो कमालगंज ब्लॉक के अंतर्गत आता है, वहां मनरेगा योजना के तहत एक बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) के अंतर्गत 42 फर्जी लेबर एक ही फोटो का बार-बार उपयोग कर जिओ टैगिंग में शामिल पाई गईं।

मौके पर सुबह 8:30 बजे निरीक्षण करने गई टीम को मज़दूरी कर रहे कोई भी मज़दूर स्थल पर उपस्थित नहीं मिला। यह दर्शाता है कि सिर्फ कागज़ों पर काम दिखाकर फर्जी भुगतान की योजना चलाई जा रही थी।

ग्राम पंचायत राठौरा की सचिव लक्ष्मी लता ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि “बिना उनके हस्ताक्षर के ही मास्टर रोल जारी हो जाते हैं।” यह बयान न केवल स्थानीय प्रशासन की लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि गंभीर गड़बड़ियों की ओर भी इशारा करता है।

घटना की जानकारी मिलने के बाद प्रभारी डीसी मनरेगा जिलाकपिल कुमार ने कहा है कि “पूरा मामला जांच के दायरे में लिया गया है, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।” उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि इस तरह की अनियमितताओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों को जल्द चिन्हित कर सजा दी जाएगी।

ग्राम पंचायत राठौरा में उजागर हुआ यह मनरेगा फर्जीवाड़ा न केवल सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि निगरानी की व्यवस्था कितनी कमजोर है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला और भी पंचायतों तक फैल सकता है। ज़रूरत है पारदर्शिता और जवाबदेही की सख्त व्यवस्था की।

जेई पर घूस मांगने और धमकी देने का आरोप, ऑडियो वायरल

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  • पीड़ित मजदूर से दस हजार की मांग, न देने पर ढाई लाख का जुर्माना और कोर्ट से जमानत कराने की धमकी

मोहम्मदाबाद (फर्रुखाबाद)। ब्लॉक मोहम्मदाबाद के नवाबगंज थाना क्षेत्र के सिरौली खेड़ा गांव में बिजली विभाग में तैनात अवर अभियंता (जेई) राम जनक पर एक गरीब मजदूर से घूस मांगने और धमकी देने का आरोप सामने आया है। मामले से जुड़ा एक ऑडियो वायरल हो गया है, जिसमें जेई पीड़ित से ₹10,000 की मांग करता सुनाई दे रहा है। जब पीड़ित ने खुद को मजदूर बताते हुए इतनी रकम देने में असमर्थता जताई, तो जेई ने ₹2.5 लाख का जुर्माना लगाने और कोर्ट से जमानत कराने की धमकी दी।

पीड़ित व्यक्ति, प्रमुख दीक्षित निवासी सिरौली खेड़ा, ने बताया कि वह मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता है और मात्र ₹100-150 रोजाना की आमदनी कर पाता है। जब बिजली विभाग की टीम ने उसके घर पर ‘कटिया’ (अवैध कनेक्शन) पकड़ने का आरोप लगाया, तो जेई राम जनक ने ₹10,000 की रिश्वत मांगी।

प्रमुख दीक्षित ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह इतने पैसे नहीं दे सकता, इस पर जेई ने कथित रूप से कहा – “अब कोर्ट से जमानत करवा लेना, ढाई लाख का जुर्माना भरना पड़ेगा, तब समझ में आएगा।”

इसके बाद जेई ने फोन काट दिया। इस पूरे मामले का ऑडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जनता में आक्रोश है और पीड़ित ने उच्च अधिकारियों से शिकायत कर न्याय की मांग की है। अब तक बिजली विभाग या स्थानीय प्रशासन की ओर से इस प्रकरण पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। क्षेत्रीय नागरिकों ने मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी जेई के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।