लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय में प्रमुख सचिव पद पर कार्यरत प्रदीप दुबे को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। उनके विरुद्ध दायर याचिका में नियुक्तियों, सेवा विस्तार, सेवा नियमावली में संशोधनों तथा प्रशासनिक एवं वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय में भी उनकी आयु और सेवा विस्तार को लेकर तीखे सवाल उठाए गए।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि विधानसभा सचिवालय में वर्ष 2008 से अब तक हुई अनेक नियुक्तियों एवं सेवा विस्तारों में नियमों की अनदेखी की गई। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि सेवा नियमावली में ऐसे संशोधन किए गए, जिनसे नियुक्ति प्रक्रिया और प्रशासनिक नियंत्रण की व्यवस्था प्रभावित हुई।
याचिका में यह आरोप भी लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की भूमिका को सीमित करने वाले कुछ निर्णय लिए गए तथा नियुक्तियों से संबंधित शक्तियों को विधानसभा सचिवालय के भीतर केंद्रीकृत किया गया। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो इससे नियुक्तियों की पारदर्शिता और संवैधानिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने प्रदीप दुबे की आयु और पद पर निरंतर बने रहने को लेकर भी सवाल उठाए। न्यायालय ने टिप्पणी की कि देश में अनेक संवैधानिक एवं उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति 65 वर्ष की आयु के बाद पद छोड़ देते हैं, ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि सेवा विस्तार का आधार क्या है और यह व्यवस्था कब तक जारी रहेगी।
मामले में कर्मचारियों के कथित उत्पीड़न, प्रशासनिक दबाव तथा कुछ कर्मचारियों द्वारा आत्महत्या जैसे अत्यंत गंभीर आरोप भी याचिका में उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन घटनाओं की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए ताकि वास्तविक तथ्य सामने आ सकें।


