नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के उरांव आदिवासी समुदाय से जुड़े एक महत्वपूर्ण संपत्ति विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल ‘घर-दामाद’ के रूप में स्वीकार किए जाने से किसी व्यक्ति को संपत्ति का कानूनी उत्तराधिकारी नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि ऐसी परंपरा का दावा किया जाता है तो उसे ठोस साक्ष्यों के साथ साबित करना आवश्यक होगा।
जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी प्रथा या परंपरा का लाभ लेने का दावा करने वाले पक्ष पर उसे प्रमाणित करने की जिम्मेदारी होती है। अदालत ने माना कि इस मामले में प्रतिवादी यह साबित करने में असफल रहे कि उरांव समुदाय में भतीजी के पति को ‘घर-दामाद’ बनाकर उत्तराधिकारी बनाने की कोई मान्य परंपरा मौजूद है।
मामला झारखंड के उरांव परिवार की पैतृक संपत्ति से जुड़ा था। प्रतिवादियों का दावा था कि संतानहीन लेदुरा उरांव ने अपनी भतीजी के पति पुनाई उरांव को घर-दामाद के रूप में स्वीकार कर उत्तराधिकारी बनाया था। वहीं याचिकाकर्ता बेजला उरांव ने इस दावे को चुनौती देते हुए कहा कि ऐसी कोई स्थापित परंपरा नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों का दावा खारिज करते हुए याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट, प्रथम अपीलीय अदालत और झारखंड हाई कोर्ट के पूर्व फैसलों को भी निरस्त कर दिया।
इस फैसले को संपत्ति उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि केवल सामाजिक या पारिवारिक दावे के आधार पर उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिल सकता, बल्कि संबंधित परंपरा का विधिक रूप से प्रमाणित होना आवश्यक है।


