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Friday, June 12, 2026
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व्यंग्य: पहले सड़क बनेगी फिर पाइप लाइन के लिए खुदेगी

(मुकेश कबीर-विभूति फीचर्स) हमारे मोहल्ले में सीवेज लाइन का ब़ड़ा टोटा था इसलिए हम झुंड बनाकर म्युनिसिपलटी के ऑफिस में धमक गए, एक दलाल के...

महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान: कानून के बाद भी क्यों बना हुआ है डर?

कविता गंगवार महिलाओं की सुरक्षा आज भी भारतीय समाज की सबसे गंभीर और संवेदनशील चुनौतियों में से एक बनी हुई है। बीते वर्षों में कानून...

ग्रामीण भारत की अनदेखी: शहरों की चमक के पीछे छुपा संघर्ष

उपेंद्र सागर कहा जाता है कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, लेकिन विडंबना यह है कि विकास की दौड़ में वही गांव आज...

न्याय की धीमी रफ्तार: तारीख़ पर तारीख़ और टूटता भरोसा

भरत चतुर्वेदी भारतीय न्याय प्रणाली में “तारीख़ पर तारीख़” आज केवल एक संवाद नहीं, बल्कि आम नागरिक की पीड़ा का प्रतीक बन चुकी है। न्याय...

शिक्षा का बाज़ारीकरण: सपनों पर भारी होती फीस और व्यवस्था

अजय कटियार शिक्षा को कभी समाज का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता था। यही शिक्षा व्यक्ति को सोचने, समझने और आगे बढ़ने की ताकत देती...

लोकतंत्र के चौराहे पर खड़ी भारतीय राजनीति: सत्ता, साख और सवाल

भारतीय राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ से आगे का रास्ता या तो लोकतंत्र को और मजबूत करेगा या फिर उसे...

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