अशोक भाटिया
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मतदाता होता है। हर चुनाव में सरकार और चुनाव आयोग लोगों से अधिक से अधिक मतदान करने की अपील करते हैं। लेकिन यदि मतदान से पहले ही मतदाता को इतनी कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़े कि वह थक-हारकर घर बैठ जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।
77 वर्ष की आयु में एक वरिष्ठ नागरिक को नया वोटर कार्ड बनवाने के लिए बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। पहले केंद्र पर भेजा गया, वहां बताया गया कि उनका फार्म किसी सुरेंद्र नाम के कर्मचारी के पास है और उसका मोबाइल नंबर भी दिया गया, जो लगातार बंद मिला। फिर जानकारी मिली कि संबंधित कर्मचारी मंदिर के पास स्थित एक स्कूल में मिलेंगे। बुजुर्ग किसी तरह वहां पहुंचे, लेकिन बताया गया कि कर्मचारी दो घंटे बाद आएंगे। उम्र के इस पड़ाव पर दो-दो घंटे इंतजार करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। वे निराश होकर वापस लौट आए।
यह केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है। यदि व्यवस्था ऐसी ही रही तो हजारों बुजुर्ग, दिव्यांग और गंभीर बीमार लोग मतदान सूची से बाहर होने का खतरा झेल सकते हैं। मतदान का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार है। इसकी प्रक्रिया को सरल बनाना प्रशासन और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है, न कि उसे इतना जटिल बना देना कि पात्र मतदाता ही हतोत्साहित हो जाए।
जरूरत इस बात की है कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग सहायता केंद्र बनाए जाएं, घर-घर सत्यापन की प्रभावी व्यवस्था हो, कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और संपर्क नंबर हमेशा सक्रिय रहें। तकनीक का उद्देश्य नागरिकों की सुविधा बढ़ाना होना चाहिए, न कि उन्हें अनावश्यक परेशान करना।
लोकतंत्र की मजबूती केवल मतदान प्रतिशत से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि सबसे कमजोर और बुजुर्ग मतदाता तक व्यवस्था कितनी सम्मानजनक और सहज पहुंचती है। यदि एक 77 वर्षीय नागरिक अपने मताधिकार के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।


