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Friday, July 24, 2026

नीट: शिक्षा से सियासत तक का सफर

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डॉ विजय गर्ग
भारत में डॉक्टर बनने का सपना हर वर्ष लाखों छात्र देखते हैं। इस सपने को साकार करने के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) को देशभर में मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश का एकमात्र माध्यम बनाया गया। इसका उद्देश्य मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और एकरूप बनाना था। लेकिन समय के साथ यह परीक्षा केवल शिक्षा का विषय नहीं रही, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई। आज नीट शिक्षा से आगे बढ़कर सियासत का भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुकी है।

नीट लागू करने का मूल उद्देश्य यह था कि देशभर में मेडिकल कॉलेजों के लिए अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं की व्यवस्था समाप्त हो और विद्यार्थियों को केवल एक परीक्षा देकर प्रवेश का अवसर मिले। इससे छात्रों का समय, धन और मानसिक दबाव कम होने की उम्मीद थी। साथ ही, योग्यता आधारित चयन प्रणाली को मजबूत करने का प्रयास भी किया गया।

हालाँकि, जैसे-जैसे नीट का दायरा बढ़ा, उससे जुड़े विवाद भी सामने आने लगे। भाषा संबंधी समस्याएँ, ग्रामीण और शहरी छात्रों के बीच अवसरों की असमानता, महंगे कोचिंग संस्थानों पर बढ़ती निर्भरता, प्रश्नपत्र लीक की घटनाएँ, परीक्षा प्रबंधन में गड़बड़ियाँ तथा परिणामों को लेकर उठे विवादों ने इस परीक्षा की विश्वसनीयता पर कई बार सवाल खड़े किए। इन घटनाओं ने छात्रों और अभिभावकों की चिंता बढ़ाई, वहीं राजनीतिक दलों को भी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राय रखने का अवसर मिला।

कुछ राज्यों ने यह तर्क दिया कि नीट उनके राज्य बोर्ड के विद्यार्थियों के साथ न्याय नहीं करती और इससे सामाजिक न्याय तथा क्षेत्रीय शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होती है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार और परीक्षा के समर्थकों का कहना है कि पूरे देश के लिए एक समान परीक्षा ही प्रतिभाशाली छात्रों को निष्पक्ष अवसर प्रदान कर सकती है। यही कारण है कि नीट अब केवल शिक्षा नीति का विषय नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक बहस का भी हिस्सा बन चुकी है।

जब भी परीक्षा में किसी प्रकार की अनियमितता, पेपर लीक या प्रशासनिक त्रुटि सामने आती है, तो राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। विपक्ष सरकार से जवाब मांगता है, जबकि सरकार सुधारों और कठोर कार्रवाई का भरोसा दिलाती है। दुर्भाग्य से इस राजनीतिक खींचतान में सबसे अधिक प्रभावित वे छात्र होते हैं, जिन्होंने वर्षों की मेहनत और उम्मीदों के साथ परीक्षा दी होती है।

यह भी सच है कि नीट ने मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया में कई सकारात्मक बदलाव किए हैं। एकल परीक्षा प्रणाली ने अनेक स्तरों पर पारदर्शिता बढ़ाई है और प्रवेश प्रक्रिया को अपेक्षाकृत सरल बनाया है। फिर भी यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आर्थिक रूप से कमजोर, ग्रामीण क्षेत्रों और विभिन्न शिक्षा बोर्डों से आने वाले छात्रों को समान अवसर प्राप्त हों। केवल समान परीक्षा आयोजित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समान तैयारी के अवसर उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है।

भविष्य में नीट को अधिक प्रभावी और विश्वसनीय बनाने के लिए परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत बनाना होगा। पेपर लीक जैसी घटनाओं पर कठोर नियंत्रण, परीक्षा संचालन में जवाबदेही, छात्रों के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता तथा विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार ऐसे कदम हैं, जो इस व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत बना सकते हैं। साथ ही, कोचिंग संस्कृति पर निर्भरता कम करने के लिए स्कूल स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देना भी समय की आवश्यकता है।

नीट पर बहस केवल इस प्रश्न तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि परीक्षा जारी रहे या नहीं। असली प्रश्न यह है कि भारत की मेडिकल शिक्षा प्रणाली को अधिक समावेशी, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण कैसे बनाया जाए। यदि इस विषय को राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर विद्यार्थियों के हित, शिक्षा की गुणवत्ता और राष्ट्रीय आवश्यकता के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो इसका समाधान अधिक प्रभावी ढंग से निकाला जा सकता है।

अंततः, नीट का सफर यह दर्शाता है कि शिक्षा से जुड़े निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं होते, बल्कि उनका गहरा सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होता है। इसलिए आवश्यक है कि इस विषय पर टकराव की बजाय संवाद, सुधार और छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया जाए। जब शिक्षा राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनेगी, तभी नीट जैसी परीक्षाएँ अपने वास्तविक उद्देश्य—योग्य, सक्षम और संवेदनशील डॉक्टर तैयार करने—में पूरी तरह सफल हो सकेंगी।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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