डॉ. विजय गर्ग
आज के समय में शिक्षा को एक सेवा के बजाय व्यापार के रूप में देखने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। शिक्षा का विपणन, जिसमें शिक्षा को खरीद-फरोख्त जैसी चीज बनाया जाता है, देश के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, बल्कि सामाजिक असमानताओं को भी बढ़ा देती है।
शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र निर्माण, सोचने की क्षमता और सामाजिक दायित्व को विकसित करना है। लेकिन जब शिक्षा को लाभ के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तो इसका केंद्र ज्ञान से हटकर धन पर आ जाता है। निजी शिक्षण संस्थान भारी फीस वसूल कर शिक्षा को केवल धनी वर्ग तक सीमित कर देते हैं, जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय छात्रों के लिए उच्च शिक्षा के द्वार बंद हो जाते हैं।
इसके साथ ही, विपणन भी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। कभी-कभी संस्थानों का ध्यान छात्रों के पूर्ण विकास के बजाय परिणामों और प्रचार पर केंद्रित हो जाता है। डिग्री को एक उत्पाद की तरह बेचने की सोच शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को कमजोर कर देती है।
शिक्षा का विपणन शिक्षकों की भूमिका को भी प्रभावित करता है। शिक्षकों को ज्ञान के मार्गदर्शक के स्थान पर सेवा प्रदाता के रूप में देखा जाता है। इससे शिक्षक-छात्र संबंधों की गहराई कम हो जाती है और सीखने की प्रक्रिया मशीनीकृत हो जाती है।
इस प्रवृत्ति का एक और खतरनाक पहलू यह है कि इससे समाज में असमानता बढ़ जाती है। जिनके पास पैसा होता है, वे बेहतर शिक्षा प्राप्त करते हैं, जबकि गरीब वर्ग पीछे रह जाता है। इससे सामाजिक न्याय और समानता के मूल सिद्धांतों को झटका लगता है।
इस समस्या का समाधान यह है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर शिक्षा को एक अधिकार के रूप में सुरक्षित करें। सरकारी शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने, फीस पर नियंत्रण रखने तथा सभी वर्गों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने की आवश्यकता है। साथ ही, शिक्षा में नैतिक सिद्धांतों को पुनः स्थापित करना भी आवश्यक है।
प्राचीन काल में शिक्षा को ‘दान’ और एक पवित्र सेवा माना जाता था। गुरु-चेला परम्परा में ज्ञान का आदान-प्रदान सर्वोत्तम कार्य था। लेकिन आज के समय में शिक्षा एक ऐसी ‘उत्पाद’ बन गई है, जिसे बाजार में बेचा और खरीदा जा रहा है। शिक्षा के इस व्यापारिक रूप को ही ‘शिक्षा का विपण्यीकरण’ कहा जाता है।
अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई शिक्षा के विपणन का सबसे घातक प्रभाव यह है कि यह समाज को दो हिस्सों में विभाजित कर रहा है। महंगे निजी स्कूल और विश्वविद्यालय केवल अमीर वर्ग के लिए हैं। दूसरी ओर, गरीब वर्ग के प्रतिभाशाली बच्चे साधनों की कमी के कारण उच्च कोटि की शिक्षा से वंचित हो जाते हैं। यह प्रथा देश में समानता की अवधारणा को समाप्त कर रही है।
लाभ के स्थान पर गुणवत्ता जब शिक्षा एक व्यवसाय बन जाती है, तो संस्थानों का मुख्य उद्देश्य ‘ज्ञान बांटना’ नहीं बल्कि ‘लाभ कमाना’ होता है। कई निजी संस्थान बहुत अधिक शुल्क लेते हैं, लेकिन वहां न तो योग्य शिक्षक होते हैं और न ही आवश्यक बुनियादी ढांचा। परिणामस्वरूप, छात्रों के पास डिग्री होती है, लेकिन कौशल की भारी कमी रहती है।
मानसिक तनाव और प्रतिस्पर्धा बाज़ारीकरण ने शिक्षा को एक अंधाधुंध दौड़ बना दिया है। कोचिंग केंद्रों और निजी संस्थानों ने छात्रों पर सौ प्रतिशत अंक लेने का इतना दबाव डाला है कि बच्चों की बचपन और रचनात्मकता समाप्त हो रही है। इस दबाव के कारण अक्सर छात्रों में मानसिक तनाव और आत्महत्या जैसी घटनाएं होती हैं।
नैतिकता का पतन शिक्षा का उद्देश्य अच्छे इंसानों को बनाना था, लेकिन व्यावसायिक माहौल में छात्र खुद को ‘ग्राहक” के रूप में समझने लगे हैं। जब शिक्षा खरीदी जाती है, तो शिक्षक और छात्र का पवित्र संबंध समाप्त हो जाता है और उसे ‘सेवा प्रदाता” और ‘ग्राही” तक सीमित कर दिया जाता है। इससे समाज में नैतिक मूल्यों की गिरावट आती है।
खोज और मौलिकता की कमी बाजार केवल वही बेचता है जिसकी मांग होती है। इसी प्रकार, शिक्षा के बाज़ारीकरण के कारण केवल ‘बाजार-उन्मुख’ पाठ्यक्रमों (जैसे इंजीनियरिंग, प्रबंधन) पर ही जोर दिया जा रहा है। साहित्य, इतिहास, दर्शन और बुनियादी विज्ञान जैसे विषय पीछे छूट रहे हैं, जो किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
अंत में यह कहा जा सकता है कि शिक्षा का विपणन देश के भविष्य के लिए घातक है। यदि शिक्षा को केवल व्यापार बनने से नहीं रोका गया, तो इससे समाज में असमानता और अन्याय और गहरा हो जाएगा। इसलिए शिक्षा को एक पवित्र जिम्मेदारी और सामाजिक अधिकार के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
डॉ. विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट पंजाब


