प्रभात यादव
भारत की संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा का प्रतिबिंब भी है। यहां पक्ष और विपक्ष की भूमिका एक-दूसरे के विरोध तक सीमित नहीं होती, बल्कि संतुलन, निगरानी और जनहित की रक्षा से जुड़ी होती है। जब संसद सुचारू रूप से चलती है, तो लोकतंत्र मजबूत होता है, और जब टकराव हावी हो जाता है, तो सवाल पूरे सिस्टम पर खड़े होते हैं।
सत्ता पक्ष: निर्णय और जवाबदेही
सत्ता पक्ष का दायित्व होता है कि वह अपने चुनावी वादों को नीतियों और कानूनों में बदले। सरकार बहुमत के बल पर फैसले लेती है, बजट पेश करती है और देश की दिशा तय करती है। लेकिन बहुमत के साथ जवाबदेही भी आती है। संसद में सवालों का सामना करना, बहस को सुनना और आवश्यक संशोधन स्वीकार करना सत्ता पक्ष की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
हाल के वर्षों में सरकार की ओर से तेज़ी से विधेयक लाने और पारित कराने की प्रवृत्ति बढ़ी है। सत्ता पक्ष इसे “निर्णय क्षमता” बताता है, जबकि विपक्ष इसे “बहस से बचने” के रूप में देखता है। यही टकराव संसद की कार्यवाही को बार-बार बाधित करता है।
केवल सरकार का विरोध करना नहीं है, बल्कि नीतियों की समीक्षा, कमियों को उजागर करना और जनता की आवाज़ बनना भी है। मजबूत विपक्ष सरकार को निरंकुश होने से रोकता है। सवाल पूछना, स्थगन प्रस्ताव लाना और सदन में बहस की मांग करना विपक्ष के संवैधानिक अधिकार हैं।
लेकिन जब विपक्ष का विरोध हंगामे में बदल जाता है और सदन की कार्यवाही ठप हो जाती है, तो इसका नुकसान भी लोकतंत्र को ही होता है। जनता के मुद्दे बहस की बजाय शोर में दब जाते हैं।
आज संसद में अक्सर देखने को मिलता है कि सरकार विपक्ष पर “अनावश्यक हंगामे” का आरोप लगाती है, वहीं विपक्ष सरकार पर “आवाज़ दबाने” का। यह टकराव कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि महत्वपूर्ण विधेयकों पर सार्थक चर्चा ही नहीं हो पाती।
यह स्थिति न तो सत्ता पक्ष के लिए अच्छी है और न ही विपक्ष के लिए। संसद का ठप होना दरअसल जनता के सवालों का ठप होना है।
संसद को प्रभावी बनाने के लिए दोनों पक्षों को अपनी भूमिका की गंभीरता समझनी होगी।
सत्ता पक्ष को बहुमत के साथ संवाद का रास्ता भी खुला रखना होगा।
विपक्ष को विरोध के साथ वैकल्पिक सुझाव और रचनात्मक बहस को प्राथमिकता देनी होगी।
संसद तभी मजबूत होगी जब भारतीय संसद में बहस शोर पर और तर्क टकराव पर भारी पड़ेंगे।
पक्ष और विपक्ष लोकतंत्र के दो पहिए हैं। एक भी कमजोर पड़ा तो व्यवस्था लड़खड़ा जाती है। संसद में सहमति और असहमति दोनों जरूरी हैं, लेकिन देशहित में यह ज़रूरी है कि दोनों टकराव नहीं, समाधान की राजनीति को आगे बढ़ाएं।

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