डॉ. विजय गर्ग
कई पीढ़ियों से विद्यार्थियों को मुख्य रूप से सीखने वालों के रूप में देखा जाता रहा है—ऐसे युवा जिनकी मुख्य जिम्मेदारी स्कूल जाना, किताबें पढ़ना, असाइनमेंट पूरा करना और परीक्षाओं की तैयारी करना मानी जाती थी। लेकिन आज बचपन और किशोरावस्था का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। जेनरेशन अल्फा ( जेन-अल्फा ), जिसमें सामान्यतः 2010 के दशक के शुरुआती वर्षों के बाद जन्मे बच्चों को शामिल किया जाता है, स्मार्टफोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया, त्वरित संचार और सूचना तक अभूतपूर्व पहुंच वाली दुनिया में बड़ी हो रही है। इसलिए विद्यार्थी अब केवल ज्ञान प्राप्त नहीं कर रहे, बल्कि सवाल पूछ रहे हैं, नई चीजें रच रहे हैं, अपने विचार साझा कर रहे हैं और अपने आसपास की दुनिया को प्रभावित भी कर रहे हैं।
यह विद्यार्थी की आवाज़ के उभरने का दौर है।
जेन-अल्फा तकनीक को दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानकर बड़ी हो रही है। जिस सवाल का जवाब खोजने के लिए पहले पुस्तकालय जाना पड़ता था, आज उसके बारे में कुछ ही सेकंड में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। किसी विद्यार्थी के पास कोई विचार है तो वह वीडियो बना सकता है, प्रस्तुति तैयार कर सकता है, ब्लॉग लिख सकता है, डिजिटल प्रोजेक्ट बना सकता है या अपनी बात बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचा सकता है। तकनीक ने युवाओं को वे साधन बहुत कम उम्र में उपलब्ध करा दिए हैं, जो पिछली पीढ़ियों को जीवन के काफी बाद के चरण में मिलते थे।
लेकिन जेन-अल्फा की असली ताकत केवल तकनीक नहीं है। असली ताकत सवाल पूछने और जवाब की अपेक्षा रखने वाले आत्मविश्वास में है।
आज के विद्यार्थी शिक्षा, करियर, समाज और पर्यावरण से जुड़ी पारंपरिक धारणाओं पर सवाल करने के लिए अधिक तैयार हैं। वे पूछ सकते हैं कि सीखना हमेशा कक्षा की चार दीवारों तक ही सीमित क्यों हो? सफलता को केवल अंकों से ही क्यों मापा जाए? और युवाओं को अपने भविष्य से संबंधित चर्चाओं में भाग लेने के लिए वयस्क होने तक इंतजार क्यों करना चाहिए?
इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी युवा द्वारा व्यक्त किया गया हर विचार सही ही हो। बोलने के अधिकार के साथ सुनने की क्षमता, जानकारी की पुष्टि करने की आदत, विभिन्न विचारों को समझने की योग्यता और असहमति को स्वीकार करने की परिपक्वता भी आवश्यक है। विद्यार्थी की आवाज़ तभी सार्थक बनती है जब उसके साथ आलोचनात्मक सोच और जिम्मेदारी भी जुड़ी हो।
यहां स्कूलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। विद्यार्थियों को केवल निर्देशों का पालन करने वाले निष्क्रिय प्राप्तकर्ता समझने के बजाय, शिक्षण संस्थानों को उन्हें विचार-विमर्श, परियोजनाओं, स्कूल से जुड़े निर्णयों और सामुदायिक गतिविधियों में भाग लेने के अवसर देने चाहिए। विद्यार्थी परिषदें, वाद-विवाद, शोध परियोजनाएं, नवाचार क्लब, पर्यावरण अभियान और सहपाठी-अध्ययन जैसी गतिविधियां कक्षा को ऐसी जगह बना सकती हैं, जहां युवा केवल क्या सोचना है नहीं, बल्कि कैसे सोचना है, यह भी सीखें।
डिजिटल दुनिया ने प्रभाव के अर्थ को भी बदल दिया है। किसी विद्यार्थी के कक्षा में दर्शकों की संख्या भले ही कम हो, लेकिन डिजिटल दुनिया में उसकी पहुंच बहुत बड़ी हो सकती है। यह अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। युवा पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा, विज्ञान, दया और सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरूकता पैदा कर सकते हैं। लेकिन गलत जानकारी, ऑनलाइन दबाव और बिना सोचे-समझे सामग्री साझा करने से गंभीर समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। इसलिए डिजिटल साक्षरता आधुनिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बननी चाहिए।
माता-पिता को भी इस पीढ़ी के साथ अपने संबंधों के बारे में नई सोच विकसित करने की आवश्यकता है। केवल इसलिए कि बच्चे कम उम्र के हैं, उनके विचारों को नजरअंदाज करने के बजाय उन्हें सुना जाना चाहिए। सुनने का अर्थ हर बात से सहमत होना नहीं है। इसका अर्थ है ऐसा स्वस्थ वातावरण बनाना, जिसमें बच्चे अपने विचार व्यक्त कर सकें, कठिन सवाल पूछ सकें और सही मार्गदर्शन से सीख सकें।
विद्यार्थियों की बढ़ती आवाज़ नेतृत्व की पारंपरिक धारणा को भी चुनौती दे रही है। नेतृत्व अब केवल स्नातक होने या नौकरी शुरू करने के बाद आरंभ होने वाली चीज नहीं रह गई है। जो विद्यार्थी स्वच्छता अभियान चलाता है, किसी स्थानीय समस्या का समाधान खोजने का प्रयास करता है, सहपाठियों की पढ़ाई में मदद करता है, सामुदायिक सेवा में भाग लेता है या किसी महत्वपूर्ण मुद्दे के बारे में जागरूकता पैदा करता है, वह पहले से ही नेतृत्व का अभ्यास कर रहा है।
इस प्रकार जेन-अल्फा विद्यार्थी होने के अर्थ को भी नया रूप दे सकती है। भविष्य का विद्यार्थी केवल पाठ्य-पुस्तकों का उपभोक्ता नहीं होगा। वह तेजी से सृजनकर्ता, सहयोगी, समस्या-समाधानकर्ता, संचारक और जिम्मेदार नागरिक बनेगा।
लेकिन विद्यार्थी की शक्ति का अर्थ मार्गदर्शन को अस्वीकार करना नहीं होना चाहिए। युवाओं को स्वतंत्रता की आवश्यकता है, लेकिन साथ ही विवेक की भी। उन्हें मंच चाहिए, लेकिन सीमाओं की भी आवश्यकता है। उन्हें आत्मविश्वास चाहिए, लेकिन विनम्रता भी जरूरी है। उद्देश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना नहीं होना चाहिए जो केवल ऊंची आवाज़ में बोले, बल्कि ऐसी पीढ़ी तैयार करना होना चाहिए जो सोच-समझकर बोले और जिम्मेदारी के साथ कार्य करे।
जेन-अल्फा की सबसे बड़ी ताकत शायद ज्ञान को कार्रवाई से जोड़ने की क्षमता हो सकती है। यदि शिक्षा उनकी जिज्ञासा, रचनात्मकता और तकनीकी आत्मविश्वास को सार्थक उद्देश्यों की ओर मोड़ सके, तो विद्यार्थी समाज के शक्तिशाली योगदानकर्ता बन सकते हैं।
कक्षा बदल रही है। शिक्षक की भूमिका बदल रही है। तकनीक बदल रही है। और इसके साथ विद्यार्थी की आवाज़ भी बदल रही है।
जेन-अल्फा केवल भविष्य के लिए तैयारी नहीं कर रही। वह अपने भविष्य को आकार देने में अभी से भागीदारी कर रही है।
डॉ. विजय गर्ग
रिटायर्ड प्रिंसिपल | शिक्षा स्तंभकार | विज्ञान लेखक | अकादमिक संपादक अकादमिक संपादक, ऑनलाइन मैगज़ीन (डब्ल्यूएनबी)
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