नई दिल्ली
सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश से जुड़े बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई शुरू हो गई है। इस दौरान केंद्र सरकार ने जनहित याचिकाओं (PIL) की उपयोगिता पर बड़ा सवाल खड़ा करते हुए कहा कि अब इस व्यवस्था को खत्म करने का समय आ गया है। यह मामला न केवल धार्मिक परंपराओं बल्कि संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया के दायरे को भी प्रभावित करता है।
केंद्र सरकार ने अपनी लिखित दलीलों में कहा कि PIL की अवधारणा उस समय बनाई गई थी, जब समाज का बड़ा वर्ग गरीबी, अशिक्षा और कानूनी सहायता के अभाव में अदालत तक नहीं पहुंच पाता था। लेकिन आज के डिजिटल युग में ई-फाइलिंग और तकनीकी सुविधाओं ने न्याय तक पहुंच आसान बना दी है। सरकार का तर्क है कि अब कोई भी व्यक्ति सीधे अदालत तक अपनी बात पहुंचा सकता है, ऐसे में PIL की आवश्यकता पहले जैसी नहीं रह गई है।
सुनवाई के दौरान सूर्यकांत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालतें पहले से ही PIL मामलों में काफी सतर्कता बरतती हैं। उन्होंने बताया कि पिछले दो दशकों में न्यायिक दृष्टिकोण में बदलाव आया है और अब केवल उन्हीं मामलों में नोटिस जारी किए जाते हैं, जिनमें ठोस आधार होता है। इससे स्पष्ट है कि न्यायपालिका भी इस व्यवस्था के दुरुपयोग को लेकर सजग है।
यह मामला पिछले करीब 26 वर्षों से अदालतों में लंबित है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन पर अब विस्तृत सुनवाई हो रही है।
वर्तमान में नौ जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जो 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक चलेगी। इस दौरान पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं। 7 से 9 अप्रैल तक याचिकाकर्ताओं और उनके समर्थकों की सुनवाई हुई, जबकि 14 से 16 अप्रैल के बीच विरोध करने वाले पक्ष अपने तर्क रखेंगे।
यह सुनवाई केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय करेगी कि धार्मिक स्थलों पर परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। साथ ही, PIL जैसे महत्वपूर्ण कानूनी उपकरण के भविष्य पर भी इसका दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है, जिससे आने वाले समय में न्यायिक व्यवस्था की दिशा तय होगी।


