प्रशांत कटियार
आज के दौर में इंसान की जिंदगी जितनी तेज हुई है, उतनी ही उलझी भी नजर आती है। हर कोई भाग रहा है,कभी काम के पीछे, कभी सफलता के पीछे, तो कभी दिखावे की दौड़ में। इसी भागदौड़ ने इंसान से सबसे कीमती चीज छीन ली है रिश्तों के लिए समय। अब यह समझ पाना मुश्किल हो गया है कि आदमी के पास सच में समय नहीं है या फिर उसका मन नहीं करता।
हाल ही में इसी विषय पर हुई एक चर्चा में कई दिलचस्प और सोचने वाले मत सामने आए। कुछ लोगों का मानना था कि आज के इंसान में अहंकार यानी ईगो बहुत बढ़ गया है, जिसने उसे भीतर से जकड़ लिया है। अब लोग यह सोचने लगे हैं कि अगर वे ज्यादा बातचीत करेंगे, तो सामने वाला उन्हें हल्के में लेने लगेगा। ऐसे में लोग खुद को सीमित कर लेते हैं, अपने ही दायरे में कैद हो जाते हैं।
दूसरी ओर कुछ लोगों का तर्क यह भी रहा कि सोशल मीडिया ने इस सोच को और गहरा कर दिया है। आज लोगों की पहचान उनके फॉलोअर्स की संख्या से होने लगी है। यदि किसी के पास 10 हजार फॉलोअर्स हैं, तो दूसरा यह सोचकर संतोष कर लेता है कि उसके पास 12 हजार हैं, वह किसी से कम नहीं है। इस तुलना और दिखावे की मानसिकता ने रिश्तों की सच्चाई को पीछे छोड़ दिया है।
चर्चा के दौरान एक अनुभवी व्यक्ति ने यह भी कहा कि असल समय पर वही लोग काम आते हैं, जिन्हें समाज अक्सर फालतू या खलिहर कहकर नजरअंदाज करता है। हालांकि इस बात पर भी बहस हुई, क्योंकि हर स्थिति में यह सही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार ऐसे लोगों पर भरोसा करना भी नुकसानदायक साबित हो सकता है।इन तमाम विचारों के बीच एक बात साफ तौर पर सामने आती है कि इंसान कहीं न कहीं अपने ही बनाए जाल में उलझता जा रहा है।
समय की कमी, अहंकार, तुलना और दिखावा इन सबने मिलकर उसे अपनों से दूर कर दिया है। जबकि सच्चाई यह है कि जीवन की असली खुशी और सुकून रिश्तों में ही छिपा होता है।जरूरत इस बात की है कि हम अपने व्यस्त जीवन से थोड़ा समय निकालें अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपने दोस्तों के लिए। क्योंकि अंत में यही रिश्ते हमारे साथ खड़े रहते हैं। थोड़ी सी बातचीत, थोड़ी सी समझ और थोड़ा सा समय यही वो चीजें हैं जो जिंदगी को सुकून से भर सकती हैं।
लेखक: यूथ इंडिया के स्टेट हेड और सोशल मीडिया दार्शनिक हैँ।


