काबुल: अफगानिस्तान पर किए गए हवाई हमले को लेकर पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि इस्लामी दुनिया के भीतर भी आलोचना का सामना कर रहा है। इस हमले के बाद मुस्लिम धर्मगुरुओं और संगठनों ने पाकिस्तान की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं और इसे इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ बताया है।
अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम विद्वान संघ ने पाकिस्तान के इस कदम की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह हमला न केवल मानवीय मूल्यों का उल्लंघन है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून के भी खिलाफ है। संगठन ने पाकिस्तान से तुरंत इस तरह की सैन्य कार्रवाइयों को रोकने की अपील की है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में हुए इस हवाई हमले में भारी जनहानि हुई है। बताया जा रहा है कि इस हमले में करीब 400 लोगों की मौत हो गई, जबकि 250 से अधिक लोग घायल हुए हैं। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है।
मुस्लिम विद्वानों ने विशेष रूप से उस अस्पताल पर हमले को लेकर गहरी चिंता जताई है, जिसे निशाना बनाया गया था। उनका कहना है कि किसी भी हाल में अस्पताल जैसे मानवीय संस्थानों पर हमला करना स्वीकार्य नहीं है।
संघ ने इस पूरे मामले की पारदर्शी और स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए कहा कि इसके लिए एक निष्पक्ष आयोग का गठन किया जाना चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो सके।
अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबिहुल्लाह मुजाहिद ने भी इस हमले की पुष्टि करते हुए कहा कि पाकिस्तानी हवाई हमले में काबुल स्थित एक नशा मुक्ति अस्पताल को निशाना बनाया गया, जिससे अस्पताल का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस हमले में इलाज करा रहे कई मरीजों की जान चली गई, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। इस घटना ने मानवीय संकट को और गहरा कर दिया है।
बताया जा रहा है कि यह हमला उस समय हुआ, जब दोनों देशों की सीमा पर गोलीबारी की घटना सामने आई थी। इसके कुछ ही घंटों बाद पाकिस्तान की ओर से यह हवाई कार्रवाई की गई, जिससे हालात और बिगड़ गए।
इस बीच पाकिस्तान ने ईद-उल-फितर के मद्देनजर अपने सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन गजब लिल हक’ को अस्थायी रूप से रोकने का फैसला किया है। यह निर्णय सऊदी अरब, कतर और तुर्किये जैसे इस्लामी देशों के अनुरोध पर लिया गया बताया जा रहा है।
पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने कहा कि सरकार ने क्षेत्र में शांति बनाए रखने और धार्मिक त्योहार के सम्मान में यह कदम उठाया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव का भी परिणाम हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है। दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई गहरी होती जा रही है, जिसका असर क्षेत्रीय स्थिरता पर भी पड़ सकता है।
मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी इस हमले को लेकर चिंता जताई है और पाकिस्तान से संयम बरतने की अपील की है। कई देशों ने नागरिक ठिकानों को निशाना बनाने को अस्वीकार्य बताया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाती हैं, बल्कि आम लोगों के जीवन को भी खतरे में डाल देती हैं। ऐसे में सभी पक्षों को संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान तलाशना चाहिए।
फिलहाल यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ता जा रहा है और पाकिस्तान पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस मामले में क्या कार्रवाई होती है और क्या पीड़ितों को न्याय मिल पाता है।


