-सुनील कुमार महला
हाल ही में, यानी कि 13 मार्च 2026 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए पीरियड लीव (मासिक धर्म अवकाश) को अनिवार्य करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। दरअसल,भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह बात कही है कि इस तरह की नीति को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने के कुछ नकारात्मक परिणाम भी हो सकते हैं। वास्तव में इस क्रम में अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि यदि इस प्रकार का प्रावधान कानून के रूप में लागू किया गया, तो कई नियोक्ता महिलाओं को रोजगार देने से ही हिचक सकते हैं, जिससे उनके करियर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने पेड पीरियड लीव को अनिवार्य बनाने की मांग वाली याचिका सुनने से ही इंकार कर दिया और इस मुद्दे पर व्यावहारिक चिंताओं को सामने रखा। यहां पाठकों को बताता चलूं कि सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में यह मांग की गई थी कि देशभर में कामकाजी महिलाओं और छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान होने वाली शारीरिक परेशानियों को देखते हुए हर महीने कुछ दिनों का अवकाश दिया जाए। याचिका में यह तर्क दिया गया कि गर्भावस्था के लिए तो अवकाश का प्रावधान किया गया है, लेकिन मासिक धर्म से जुड़ी तकलीफों के लिए कोई सार्वभौमिक व्यवस्था नहीं है। साथ ही, यह भी कहा गया कि कुछ राज्यों और कई निजी कंपनियों में महीने में दो दिन के ‘पीरियड लीव’ का प्रावधान किया गया है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट सभी राज्यों को ऐसे नियम बनाने का निर्देश दे। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम. आर. शमशाद ने यह भी बताया कि केरल सरकार ने स्कूलों में इस प्रकार की व्यवस्था लागू की है और देश की कई निजी कंपनियाँ भी स्वेच्छा से ‘पेड पीरियड लीव’ दे रही हैं।मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यदि कोई कंपनी अपनी इच्छा से पीरियड्स के दौरान छुट्टी दे रही है तो यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन जैसे ही इसे कानून के रूप में सख्ती से लागू किया जाएगा, उसके दूसरे पहलुओं पर भी विचार करना होगा। अदालत ने आशंका व्यक्त की कि ऐसा प्रावधान अनिवार्य होने पर संभव है कि नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बचने लगें। इससे महिलाओं को सरकारी नौकरियों, न्यायपालिका या अन्य पेशों में अवसर मिलने में कठिनाई हो सकती है और उनका करियर प्रभावित हो सकता है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि कई बार ऐसी याचिकाएँ एक तरह का डर पैदा करती हैं और यह संदेश देती हैं कि जैसे मासिक धर्म महिलाओं के साथ होने वाली कोई नकारात्मक या असाधारण घटना है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह कहा है कि महिलाओं को इतना कमजोर नहीं समझना चाहिए। उन्होंने याचिकाकर्ता से कहा कि इस प्रकार की मांग कार्यस्थल पर महिलाओं के विकास और उनकी परिपक्वता को लेकर गलत मानसिकता भी पैदा कर सकती है। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता पहले ही अपनी मांग महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष रख चुके हैं, इसलिए सरकार सभी हितधारकों से चर्चा कर इस विषय पर कोई नीति बनाने पर विचार कर सकती है। अदालत ने संबंधित प्राधिकरणों को यह सुझाव दिया कि वे इस अभ्यावेदन पर विचार करें और विभिन्न पक्षों से परामर्श करके नीति का प्रारूप तैयार करें। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि विचार अच्छा हो सकता है, लेकिन नियोक्ताओं के पक्ष को भी ध्यान में रखना आवश्यक है, क्योंकि उन्हें पेड लीव देने की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ेगी। वास्तव में, इस पूरे मुद्दे पर समाज और महिलाओं के बीच भी अलग-अलग मत सामने आए हैं। कई महिलाओं का मानना है कि उन्होंने दशकों के संघर्ष के बाद कार्यस्थल पर बराबरी का अधिकार प्राप्त किया है। ऐसे में विशेष अवकाश की अनिवार्यता उन्हें पुरुषों की तुलना में कमजोर या कम सक्षम दिखा सकती है। कॉर्पोरेट संस्कृति में अक्सर उपलब्धता को सफलता का पैमाना माना जाता है, इसलिए महीने में निश्चित छुट्टी लेने वाली महिला को महत्वपूर्ण परियोजनाओं या नेतृत्व की भूमिकाओं से बाहर रखा जा सकता है। कुछ महिलाओं का यह भी मानना है कि अनिवार्य पीरियड लीव के कारण कई संस्थान महिलाओं के बजाय पुरुषों को अधिक प्राथमिकता देने लगेंगे, जिससे कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी कम हो सकती है। उनका यह भी कहना है कि मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसे कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। कई महिलाएँ सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का स्वागत भी कर रही हैं।वहीं दूसरी ओर कुछ महिलाओं का यह मानना है कि इस विषय में एक संतुलित या मध्य मार्ग होना चाहिए। उनके अनुसार ‘पीरियड लीव’ को अनिवार्य बनाने के बजाय वर्क फ्रॉम होम या फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स का विकल्प दिया जाना चाहिए। इससे महिला का काम भी प्रभावित नहीं होगा और उसे कार्यालय के तनावपूर्ण वातावरण से राहत भी मिल सकेगी। उनका यह भी मानना है कि इस प्रकार की व्यवस्था से महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा और उनकी पेशेवर गरिमा भी बनी रहेगी। दरअसल कई महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान दर्द, ऐंठन, मतली और माइग्रेन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में लगातार काम करना उनके लिए मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यंत कठिन हो सकता है। इसलिए कुछ महिलाओं का कहना है कि पीरियड लीव का उद्देश्य भले ही नेक और संवेदनशील है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका ऐसा होना चाहिए, जिससे महिलाओं की व्यावसायिक गरिमा और नौकरी की सुरक्षा पर कोई आंच न आए।बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि विश्व के कई देशों में पीरियड लीव (मासिक धर्म अवकाश) को लेकर विभिन्न प्रकार के प्रावधान मौजूद हैं, हालांकि इसकी व्यवस्था हर देश में एक जैसी नहीं है। गौरतलब है कि कुछ देशों ने इसे श्रम कानून का हिस्सा बनाया है। जबकि कुछ स्थानों पर इसे कुछ कंपनियों या संस्थानों द्वारा अपनी इंटरनल पालिसी के रूप में लागू किया गया है।उदाहरण के लिए नाइके और भारत की कंपनी जौमेटो ने भी महिला कर्मचारियों के लिए पीरियड लीव की नीति लागू की है। यहां यदि हम देशों की बात करें तो जापान में वर्ष 1947 से ही महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अवकाश लेने का अधिकार दिया गया है। यदि किसी महिला कर्मचारी को पीरियड के दौरान काम करने में कठिनाई होती है, तो वह छुट्टी ले सकती है, हालांकि यह छुट्टी वेतन सहित होगी या नहीं, यह कंपनी की नीति पर निर्भर करता है। इसी प्रकार दक्षिण कोरिया में महिला कर्मचारियों को हर महीने एक दिन की मेंस्ट्रुअल लीव का अधिकार प्राप्त है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इंडोनेशिया के श्रम कानून में भी महिलाओं को मासिक धर्म के पहले दो दिनों में अवकाश लेने की अनुमति दी गई है। इतना ही नहीं, अफ्रीकी देश जांबिया में ‘मदर्स डे लीव’ के नाम से हर महीने एक दिन की पीरियड लीव दी जाती है, जिसके लिए चिकित्सकीय प्रमाणपत्र की आवश्यकता भी नहीं होती। हाल के वर्षों में स्पेन ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए वर्ष 2023 में ‘पेड पीरियड लीव’ को कानूनी मान्यता प्रदान की, जिससे गंभीर मासिक धर्म पीड़ा से पीड़ित महिलाएं चिकित्सकीय सलाह के आधार पर अवकाश ले सकती हैं। बहरहाल, यहां कहना ग़लत नहीं होगा कि इस प्रकार से वैश्विक स्तर पर पीरियड लीव को लेकर एकरूपता नहीं है, लेकिन मासिक धर्म से जुड़ी स्वास्थ्य और गरिमा की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न देशों और संस्थानों में इसके प्रति जागरूकता और नीतिगत पहल लगातार बढ़ रही है। अंत में यहां पर निष्कर्ष के तौर पर यही कहना चाहूंगा कि ‘पीरियड लीव’ का मुद्दा केवल अवकाश देने या न देने का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह कार्यस्थल पर समानता, संवेदनशीलता और व्यावहारिकता के बीच संतुलन खोजने का विषय है। माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए यह संकेत दिया गया है कि किसी भी नीति को लागू करते समय उसके दूरगामी सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि महिलाओं को कमजोर मानकर विशेष प्रावधान बनाने के बजाय ऐसे समाधान तलाशे जाने चाहिए जो उनकी गरिमा, अवसरों की समानता और पेशेवर विकास को प्रभावित न करें।इस संदर्भ में कई महिलाओं की राय है कि अनिवार्य पीरियड लीव के बजाय फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स या वर्क फ्रॉम होम जैसे विकल्प अधिक व्यावहारिक हो सकते हैं। इससे एक ओर महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान होने वाली शारीरिक असुविधा से कुछ राहत मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर उनके करियर, आत्मविश्वास और पेशेवर अवसरों पर भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसलिए आज के समय में आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, संस्थान और समाज मिलकर ऐसा संतुलित और संवेदनशील मॉडल विकसित करें, जो महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और कार्यस्थल पर समान अवसर-तीनों को साथ लेकर आगे बढ़े।
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।मोबाइल 9828108858


