नई दिल्ली। देशभर के मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर पशुओं की बलि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गई है। इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने सरकार को नोटिस जारी कर निर्धारित समय के भीतर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।
याचिका में कहा गया है कि कई राज्यों में आज भी धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिरों में पशुओं की बलि दी जाती है, जो पशु क्रूरता की श्रेणी में आती है। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि देशभर में इस प्रथा पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा-28 में धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पशु वध को छूट दी गई है, जिसका कई स्थानों पर दुरुपयोग हो रहा है। याचिकाकर्ता ने इस धारा में संशोधन की मांग भी की है ताकि धर्म के नाम पर होने वाली पशु क्रूरता को रोका जा सके।
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस मुद्दे पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यह मामला धार्मिक आस्था, परंपरा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है, इसलिए सरकार का पक्ष जानना आवश्यक है।
कई राज्यों में अब भी जारी है परंपरा
देश के कई हिस्सों—विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों, हिमालयी क्षेत्रों, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों—में त्योहारों और विशेष धार्मिक आयोजनों के दौरान पशु बलि की परंपरा आज भी देखने को मिलती है। पशु अधिकार संगठनों का कहना है कि यह प्रथा आधुनिक समाज और पशु संरक्षण के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें
अब इस मामले में केंद्र सरकार के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई करेगा। माना जा रहा है कि इस सुनवाई के बाद अदालत देशभर में मंदिरों में पशु बलि को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में उठी मंदिरों में पशु बलि पर रोक की मांग


