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Tuesday, March 10, 2026

हार्मोनल बदलाव भी बन सकते हैं वजाइनल इंफेक्शन की वजह, जानिए डॉक्टर की राय

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यूथ इंडिया
महिलाओं में वजाइनल इंफेक्शन एक आम लेकिन संवेदनशील स्वास्थ्य समस्या है, जिससे बड़ी संख्या में महिलाएं जीवन के किसी न किसी समय प्रभावित होती हैं। आमतौर पर लोग इसे केवल साफ-सफाई की कमी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे कई मेडिकल कारण भी हो सकते हैं। इनमें हार्मोनल असंतुलन एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।

दरअसल, महिला के शरीर में वजाइना के अंदर प्राकृतिक रूप से लैक्टोबैसिलस नामक अच्छे बैक्टीरिया मौजूद होते हैं। ये बैक्टीरिया वजाइना का पीएच संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं और हानिकारक बैक्टीरिया व फंगस को बढ़ने से रोकते हैं। जब किसी कारण से वजाइना का पीएच बैलेंस बिगड़ जाता है, तो यीस्ट या बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं और वजाइनल इंफेक्शन की स्थिति बन जाती है।

गुरुग्राम के क्लाउडनाइन हॉस्पिटल के ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी विभाग की डायरेक्टर डॉ. चेतना जैन के अनुसार महिलाओं के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव वजाइनल हेल्थ को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं। कई बार यही हार्मोनल बदलाव वजाइनल इंफेक्शन का कारण बन जाते हैं।

डॉ. चेतना बताती हैं कि वजाइनल इंफेक्शन होने पर महिलाओं को कई तरह के लक्षण महसूस हो सकते हैं। इनमें वजाइना में खुजली या जलन होना, गाढ़ा या बदबूदार डिस्चार्ज आना, डिस्चार्ज के रंग में बदलाव होना, पेशाब करते समय जलन या दर्द महसूस होना और कई बार यौन संबंध के दौरान दर्द होना शामिल है। अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें या बार-बार दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं के शरीर में मौजूद एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन वजाइना की सेहत को प्रभावित करते हैं। जब इन हार्मोन का संतुलन बिगड़ता है, तो वजाइना का पीएच लेवल बदल सकता है और इससे बैक्टीरिया या फंगस के पनपने का खतरा बढ़ जाता है। यही कारण है कि महिलाओं के जीवन के कुछ चरणों में वजाइनल इंफेक्शन का जोखिम ज्यादा देखा जाता है।

मासिक धर्म के समय भी महिलाओं के शरीर में हार्मोन स्तर में लगातार बदलाव होते रहते हैं। कई बार एस्ट्रोजन का स्तर कम होने के कारण वजाइना की परत पतली और सूखी हो जाती है। इस स्थिति में बैक्टीरिया के पनपने की संभावना बढ़ जाती है और संक्रमण हो सकता है। इसके अलावा पीरियड्स के दौरान लंबे समय तक एक ही पैड का इस्तेमाल करने या सही तरीके से सफाई न रखने से भी इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इस दौरान वजाइना का पीएच लेवल बदल जाता है।

गर्भावस्था के दौरान भी महिलाओं के शरीर में हार्मोन तेजी से बदलते हैं। यही वजह है कि इस समय वजाइनल इंफेक्शन होने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि अधिकांश मामलों में यह संक्रमण बच्चे के लिए खतरनाक नहीं होता, लेकिन गर्भवती महिला को असुविधा हो सकती है। इसलिए डॉक्टर अक्सर कुछ दिनों तक दवा या क्रीम इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। कई रिसर्च में यह भी पाया गया है कि गर्भावस्था के अंतिम महीनों में वजाइनल इंफेक्शन का खतरा अधिक हो सकता है, इसलिए इस समय महिलाओं को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है।

मेनोपॉज के दौरान भी महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव काफी अधिक होते हैं। इस समय एस्ट्रोजन का स्तर कम हो जाता है, जिससे वजाइना में सूखापन बढ़ सकता है और पीएच स्तर भी प्रभावित होता है। इस स्थिति में बैक्टीरियल वेजिनोसिस जैसे संक्रमण होने की संभावना बढ़ जाती है। कई महिलाओं को मेनोपॉज के दौरान वजाइना में जलन, खुजली और सूखापन की समस्या भी महसूस होती है, जो आगे चलकर इंफेक्शन का कारण बन सकती है।

इसके अलावा पीसीओएस या थायराइड जैसी हार्मोनल समस्याएं भी वजाइनल इंफेक्शन के जोखिम को बढ़ा सकती हैं। पीसीओएस की स्थिति में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का संतुलन बिगड़ जाता है और शरीर में पुरुष हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है। इसके कारण पीरियड अनियमित हो सकते हैं और वजाइना का पीएच संतुलन भी प्रभावित होता है, जिससे संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। वहीं थायराइड की समस्या भी शरीर के हार्मोनल सिस्टम को प्रभावित करती है और इससे फंगल या बैक्टीरियल इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है।

डॉक्टरों का कहना है कि हार्मोनल कारणों के अलावा कुछ अन्य स्थितियां भी वजाइनल इंफेक्शन के लिए जिम्मेदार हो सकती हैं। इनमें डायबिटीज, बार-बार एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन, बहुत ज्यादा टाइट कपड़े पहनना, सिंथेटिक अंडरगारमेंट्स का इस्तेमाल करना और असुरक्षित यौन संबंध शामिल हैं। अगर किसी महिला को साल में तीन-चार बार से ज्यादा वजाइनल इंफेक्शन हो रहा है या लक्षण गंभीर हो रहे हैं, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी हो जाता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर ब्लड टेस्ट, शुगर टेस्ट या हार्मोन प्रोफाइल की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं ताकि असली कारण का पता लगाया जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ सामान्य सावधानियां अपनाकर इस समस्या से काफी हद तक बचा जा सकता है। पीरियड्स के दौरान वजाइना को साफ और सूखा रखना चाहिए और पैड को हर चार से पांच घंटे में बदलना चाहिए। परफ्यूम वाले पैड या स्प्रे का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे वजाइना का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है। कॉटन अंडरगारमेंट पहनना बेहतर माना जाता है, क्योंकि इससे नमी कम रहती है और बैक्टीरिया के बढ़ने की संभावना घटती है।

इसके साथ ही महिलाओं को संतुलित आहार लेना चाहिए और पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए। ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना भी जरूरी है, क्योंकि डायबिटीज होने पर वजाइनल इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है। बिना डॉक्टर की सलाह के बार-बार एंटीबायोटिक दवाएं लेने से भी बचना चाहिए, क्योंकि इससे शरीर के अच्छे बैक्टीरिया भी प्रभावित हो सकते हैं।

डॉ. चेतना जैन का कहना है कि अगर किसी महिला को बार-बार वजाइनल इंफेक्शन की समस्या हो रही है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। कई बार इसके पीछे हार्मोनल असंतुलन जैसी मेडिकल समस्या हो सकती है। इसलिए समय पर जांच और सही इलाज करवाना जरूरी होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार सही देखभाल, साफ-सफाई, संतुलित जीवनशैली और नियमित स्वास्थ्य जांच के जरिए वजाइनल इंफेक्शन के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अगर किसी महिला को इसके लक्षण बार-बार दिखाई दें, तो स्वयं इलाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका माना जाता है।

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