
शरद कटियार
दुनिया तकनीकी विकास और आधुनिकता के नए शिखर छू रही है। अंतरिक्ष में जीवन की तलाश से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, मानव सभ्यता ने विज्ञान की अद्भुत प्रगति देखी है। लेकिन दूसरी ओर युद्ध की राजनीति ने इस प्रगति पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और तेल प्रतिष्ठानों पर हमलों के बाद ईरान सहित कई क्षेत्रों में “काली बारिश” जैसी घटनाओं की खबरें सामने आई हैं। यह केवल एक पर्यावरणीय घटना नहीं, बल्कि युद्ध और औद्योगिक प्रदूषण के खतरनाक गठजोड़ की चेतावनी भी है।
दुनिया भर के देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए लगातार वैश्विक मंचों पर चर्चा करते हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिक गतिविधियों और जीवाश्म ईंधन के उपयोग से वैश्विक तापमान लगभग 1.1°C तक बढ़ चुका है। इसी कारण “नेट-जीरो उत्सर्जन” की अवधारणा को आगे बढ़ाया जा रहा है।
लेकिन जब युद्ध छिड़ता है, तब यही पर्यावरणीय प्रतिबद्धताएँ अक्सर पीछे छूट जाती हैं। तेल रिफाइनरियों, पेट्रोलियम डिपो और औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर हमले से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और सूक्ष्म कण (पीएम 2.5) वातावरण में फैलते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार तेल के बड़े भंडार में आग लगने से एक दिन में लाखों टन प्रदूषक वायुमंडल में पहुँच सकते हैं।
1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान कुवैत के तेल कुओं में लगी आग से करीब 6 मिलियन बैरल तेल प्रतिदिन जलने की रिपोर्ट सामने आई थी, जिससे महीनों तक धुएँ के बादल बने रहे और कई देशों में काले कणों की बारिश दर्ज की गई थी। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे हालात में हवा में मौजूद सूट और राख वर्षा के साथ नीचे गिर सकती है, जिसे आम भाषा में “काली बारिश” कहा जाता है।
काली बारिश का वैज्ञानिक पक्ष
जब भारी मात्रा में धुआँ और सूक्ष्म कण वायुमंडल में पहुँचते हैं, तो वे बादलों के साथ मिलकर वर्षा के दौरान जमीन पर गिर सकते हैं। इस प्रक्रिया में वर्षा का पानी सामान्य से अधिक गहरा या काला दिखाई दे सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायु में मौजूद पीएम 2.5 कण मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक हैं और लंबे समय तक संपर्क रहने पर अस्थमा, फेफड़ों के संक्रमण और हृदय रोगों का खतरा बढ़ा सकते हैं।
कृषि और जनस्वास्थ्य पर असर
यदि प्रदूषित कणों के साथ बारिश होती है तो इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि और मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।कणों के जमाव से पत्तियों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता घट सकती है। रासायनिक अवशेष मिट्टी की संरचना को प्रभावित कर सकते हैं।प्रदूषित हवा और पानी से श्वसन रोग बढ़ने की संभावना रहती है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि लंबे समय तक ऐसा प्रदूषण बना रहे तो उत्पादन पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
युद्ध केवल सीमाओं पर लड़ी जाने वाली लड़ाई नहीं है। इसका असर कई बार पड़ोसी देशों और वैश्विक पर्यावरण तक पहुँच जाता है। वायु प्रवाह की दिशा के अनुसार प्रदूषक हजारों किलोमीटर दूर तक फैल सकते हैं।
यही कारण है कि आज पर्यावरण को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। यदि किसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर औद्योगिक या सैन्य प्रदूषण होता है तो उसका प्रभाव सीमाओं से परे भी महसूस किया जा सकता है।
ईरान सहित पश्चिम एशिया के हालात यह याद दिलाते हैं कि आधुनिक सभ्यता की प्रगति के साथ-साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। विज्ञान और तकनीक मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए हैं, लेकिन यदि उनका उपयोग विनाशकारी संघर्षों में होगा तो पर्यावरण और मानवता दोनों को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है, तब यह आवश्यक है कि विकास और सुरक्षा के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा को भी समान महत्व दिया जाए।क्योंकि यदि युद्ध की आग और प्रदूषण की राख यूँ ही आसमान में भरती रही, तो आने वाले समय में बारिश केवल जीवन नहीं, बल्कि संकट की चेतावनी बनकर भी बरस सकती है।


