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Monday, March 9, 2026

ज्ञान की जननी सावित्रीबाई फुले:जिन्होंने समाज की बेड़ियाँ काटकर उड़ना सिखाया

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सुनील कुमार महला

सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका (महिला शिक्षा की अग्रदूत) ही नहीं, बल्कि एक प्रखर विचारक, महिला सशक्तीकरण की प्रेरणा, सामाजिक न्याय के संघर्ष की प्रतीक और महान समाज सुधारक थीं। प्रत्येक वर्ष 10 मार्च को उनकी पुण्यतिथि मनाई जाती है। यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 1848 में उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर पुणे के भिंडेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत का पहला आधुनिक विद्यालय शुरू किया था। वे भारत की पहली महिला प्रधानाध्यापिका (हेडमिस्ट्रेस) भी बनीं। उस दौर में किसी महिला द्वारा प्रशासनिक पद संभालना अपने आप में एक क्रांतिकारी व बड़ा साहसिक कदम था। साहसिक व बड़ा कदम इसलिए क्योंकि उस समय भारतीय समाज में लड़कियों की शिक्षा को स्वीकार नहीं किया जाता था। जिस समय समाज के एक बड़े वर्ग को वेदों और शिक्षा से दूर रखा जाता था, उस समय सावित्रीबाई फुले ने दलितों, पिछड़ों और महिलाओं को संबोधित करते हुए यह बात कही थी कि- ‘सुनहरे अवसर को हाथ से न जाने दें।’ उन्होंने शिक्षा को दुखों का अंत करने वाली संजीवनी बताया। वास्तव में, उनका मानना था कि शिक्षा केवल अक्षर-ज्ञान नहीं, बल्कि शिक्षा तो अन्याय और समाज में फैली कुरीतियों, कुप्रथाओं के विरुद्ध खड़े होने का साहस है। कहना ग़लत नहीं होगा कि सावित्रीबाई फुले ने ऐसे समय में महिला शिक्षा की मशाल जलाई, जब लड़कियों को पढ़ाना समाज में पाप समझा जाता था। कहते हैं कि वे जब स्कूल पढ़ाने जाती थीं, तब कई लोग उनका विरोध करते थे और उन पर पत्थर तथा कीचड़ तक फेंकते थे। यही कारण था कि वे अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं, ताकि स्कूल पहुँचकर कपड़े बदल सकें। उनका जीवन केवल साक्षरता तक सीमित नहीं था, बल्कि वे आर्थिक और वैचारिक स्वतंत्रता की भी मुखर समर्थक थीं। उनका साहस, त्याग और समाज सुधार के कार्य, आज भी भारत के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

भारत की पहली महिला कवयित्री:-

सावित्रीबाई फुले का नाम भारत की पहली महिला कवयित्रियों में भी लिया जाता है। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और समानता पर अनेक कविताएँ लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘काव्य फुले’ (1854) और ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ (1892) शामिल हैं। ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ वस्तुतः ज्योतिबा फुले की जीवनी के रूप में लिखी गई काव्य रचना है, जिसमें पेशवा शासन के पतन और ज्योतिबा फुले के संघर्षों का सटीक ऐतिहासिक तथा सामाजिक चित्रण मिलता है। उनकी कविताओं में शिक्षा की महत्ता और जाति प्रथा के विरुद्ध तीखा प्रतिरोध दिखाई देता है, इसलिए उन्हें आधुनिक मराठी कविता का अग्रदूत भी माना जाता है।उनकी प्रसिद्ध कविता ‘जाओ, शिक्षा प्राप्त करो’ (मराठी : ‘जा, शिकवण घ्या’) केवल एक कविता नहीं, बल्कि आधुनिक भारत का क्रांतिकारी घोषणापत्र मानी जाती है। यह कविता उनके काव्य संग्रह काव्य फुले का हिस्सा है। इस कविता में वे लिखती हैं-‘जाओ, शिक्षा प्राप्त करो, स्वावलंबी बनो, काम करो, ज्ञान और धन अर्जित करो।ज्ञान के बिना सब कुछ खो जाता है, ज्ञान के बिना हम पशु समान हो जाते हैं। इसलिए खाली मत बैठो, जाओ और शिक्षा प्राप्त करो।’ उनकी यह कविता दर्शाती है कि सावित्रीबाई फुले शिक्षा को सबसे अनमोल संपत्ति मानती थीं। उनके अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञान है। उनका मानना था कि गरीबी या जाति से भी बड़ी बाधा अज्ञान है, क्योंकि विद्या के बिना मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है और वह शोषण का शिकार बनता है। वे विशेष रूप से महिलाओं के स्वावलंबन पर जोर देती थीं। उनके अनुसार शिक्षा का अंतिम उद्देश्य व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा करना और आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाना है। उन्होंने समाज को यह स्पष्ट संदेश दिया कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और जो समय बीत गया वह वापस नहीं आता, इसलिए आज ही शिक्षा प्राप्त करने का संकल्प लेना चाहिए।

सत्यशोधक समाज की कमान:-

वर्ष 1890 में ज्योतिराव फुले के निधन के बाद सावित्रीबाई फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की कमान संभाली। उन्होंने इसके सम्मेलनों की अध्यक्षता की और संगठन के कार्यों को आगे बढ़ाया, जो उस समय के पुरुष प्रधान समाज में एक ऐतिहासिक उदाहरण था। ज्योतिबा फुले की मृत्यु के समय समाज की परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार में मुखाग्नि देने का अधिकार केवल पुरुष उत्तराधिकारी को होता था, लेकिन सावित्रीबाई फुले ने इस परंपरा को तोड़ते हुए स्वयं आगे बढ़कर उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी। उन्नीसवीं सदी के भारत में किसी महिला द्वारा अंतिम संस्कार करना अकल्पनीय साहस का कार्य था। उन्होंने विवाह की एक नई पद्धति भी प्रारंभ की, जिसे ‘सत्यशोधक विवाह’ कहा गया। इस विवाह पद्धति में ब्राह्मण पुजारियों की आवश्यकता नहीं होती थी और दहेज प्रथा का पूर्णतः विरोध किया जाता था। विवाह के मंत्रों के स्थान पर ऐसे संकल्प लिए जाते थे, जिनमें स्त्री-पुरुष समानता और शिक्षा पर बल दिया जाता था। सावित्रीबाई फुले ने बाल विवाह, सती प्रथा और छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई तथा विधवाओं और अनाथ बच्चों के लिए आश्रय गृहों की स्थापना की।

महिला सेवा मंडल की स्थापना:-

महिलाओं के अधिकारों के लिए उन्होंने 1852 में ‘महिला सेवा मंडल’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना था। उन्होंने विधवाओं के सिर मुंडवाने की अमानवीय प्रथा के खिलाफ नाइयों को संगठित किया, जिसके परिणामस्वरूप कई नाइयों ने विधवाओं के बाल काटने से इनकार कर दिया। उन्होंने दलितों और अछूतों के अधिकारों के लिए भी संघर्ष किया। उस समय अछूतों को सार्वजनिक कुओं से पानी लेने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने अपने घर का पानी का हौज उनके लिए खोल दिया। यह कदम उस समय के कट्टरपंथी समाज के लिए एक बड़ा सामाजिक संदेश था।

बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना:-

 

सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले की अपनी कोई संतान नहीं थी, लेकिन उन्होंने एक ब्राह्मण विधवा के बेटे यशवंत को गोद लिया और उसे पढ़ाकर डॉक्टर बनाया। वर्ष 1853 में उन्होंने ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की, जहाँ ऐसी विधवाओं को आश्रय दिया जाता था जो समाज के डर से अपने नवजात शिशुओं को त्यागने पर मजबूर हो जाती थीं। इसके अतिरिक्त 1876-77 के भीषण अकाल के समय उन्होंने और ज्योतिबा फुले ने मिलकर कई स्थानों पर मुफ्त भोजन केंद्र (अन्न सत्र) चलाए और ब्रिटिश सरकार पर राहत कार्य शुरू करने का दबाव डाला। अंततः 1897 में जब पुणे में ब्यूबोनिक प्लेग फैला, तब सावित्रीबाई फुले ने अपने गोद लिए हुए बेटे यशवंत के साथ मिलकर एक अस्पताल स्थापित किया और रोगियों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया। इसी दौरान एक संक्रमित बच्चे को अस्पताल ले जाते समय वे स्वयं भी प्लेग से संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।

वास्तव में, सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की वह पहली मशाल थीं, जिन्होंने रूढ़िवादिता के अंधकार को शिक्षा और साहस से चीर दिया। उन्होंने केवल अक्षर-ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि समाज के सबसे वंचित वर्गों और महिलाओं को आत्मसम्मान के साथ जीने का मार्ग दिखाया। एक कवयित्री, कुशल संगठक और निस्वार्थ समाजसेविका के रूप में उनका संपूर्ण जीवन मानवता की सेवा को समर्पित रहा। प्लेग पीड़ितों की सेवा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देना उनके त्याग, करुणा और मानवीय संवेदनाओं का सर्वोच्च प्रमाण है। आज का प्रगतिशील और शिक्षित भारत वास्तव में उनके ऐतिहासिक संघर्ष और दूरदर्शिता का ही परिणाम है। आपके जज़्बे को शत-शत नमन।

सुनील कुमार महला,फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड। मोबाइल : 9828108858

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