पश्चिम एशिया में अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध की स्थिति का असर अब भारत के उद्योगों पर भी दिखाई देने लगा है। खासकर कानपुर और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में चमड़ा, कपड़ा और प्लास्टिक उद्योग संकट का सामना कर रहे हैं। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने, आयात महंगा होने और गैस की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के कारण कई औद्योगिक इकाइयों ने उत्पादन धीमा कर दिया है। उद्योग से जुड़े उद्यमियों का कहना है कि आने वाले समय में महंगाई और बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।
निर्यातकों के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। शिपिंग कंपनियों ने मालभाड़ा और समुद्री जोखिम बीमा पहले ही तीन गुना तक बढ़ा दिया है, जिससे निर्यात लागत तेजी से बढ़ रही है। पहले जहां यूरोप तक माल पहुंचने में करीब 28 दिन लगते थे, अब कंपनियां 60 से 70 दिन का समय बता रही हैं। लॉजिस्टिक लागत बढ़ने और कच्चे माल की कीमतों में तेजी के कारण उत्पादों के दाम बढ़ना लगभग तय माना जा रहा है।
कानपुर, उन्नाव और रनियां क्षेत्र में चमड़ा उद्योग का बड़ा नेटवर्क है, जहां करीब 250 टेनरियां और जूता फैक्ट्रियां संचालित हैं। इसके अलावा कानपुर नगर और देहात में प्लास्टिक, पैकेजिंग और संबंधित उद्योगों की लगभग 150 इकाइयां हैं। इन उद्योगों में एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलता है। कच्चे माल के महंगा होने और गैस आधारित उत्पादन की अनिश्चितता के कारण कई इकाइयों ने फिलहाल काम की रफ्तार धीमी कर दी है।
उद्योग संगठनों के अनुसार प्लास्टिक उद्योग में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल तेजी से महंगा हो रहा है। प्लास्टिक दाने की कीमत जो पहले लगभग 130 रुपये प्रति किलो थी, वह अब बढ़कर करीब 190 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पैकेजिंग सामग्री, पीवीसी उत्पाद और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कई प्लास्टिक वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। साथ ही कपड़ा उद्योग में पॉलिस्टर यार्न और फाइबर के दाम भी 15 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं, जिससे आने वाले समय में कपड़ों की कीमतों में भी उछाल देखने को मिल सकता है।


