– रिमी पटेल
आज की लड़की सिर्फ एक पहचान तक सीमित नहीं है। वह बेटी है, बहन है, प्रोफेशनल है, लीडर है, और सबसे बढ़कर अपनी खुद की पहचान बनाने वाली व्यक्तित्व है। बदलते भारत में लड़कियां परंपराओं का सम्मान करते हुए आधुनिकता के साथ कदम मिला रही हैं। वे अब सिर्फ सपने नहीं देखतीं, उन्हें पूरा करने का साहस भी रखती हैं।
समाज ने लंबे समय तक लड़कियों को सीमाओं में बांधकर देखा। “यह मत करो”, “वह मत बनो”, “इतना ही काफी है”—ये वाक्य कभी उनकी उड़ान रोक देते थे। लेकिन आज की पीढ़ी ने इन धारणाओं को चुनौती दी है। शिक्षा ने उन्हें सोचने की ताकत दी है, डिजिटल दुनिया ने मंच दिया है और आत्मविश्वास ने पहचान।
आज लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं—पत्रकारिता, सेना, खेल, राजनीति, विज्ञान, स्टार्टअप और कला। वे परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाना भी सीख रही हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी हैं। आत्मनिर्भरता अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुकी है।
लेकिन चुनौतियां अभी भी खत्म नहीं हुई हैं। सोशल मीडिया के दौर में लड़कियों पर “परफेक्ट” दिखने का दबाव बढ़ा है। तुलना, ट्रोलिंग और बॉडी शेमिंग जैसी समस्याएं मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। जरूरी है कि लड़कियां अपनी तुलना किसी और से नहीं, बल्कि खुद से करें। असली सुंदरता आत्मसम्मान और आत्मविश्वास में है, न कि लाइक्स और फॉलोअर्स में।
परिवार और समाज की भूमिका भी अहम है। बेटियों को सुरक्षा के नाम पर सीमित करने के बजाय उन्हें सक्षम बनाना चाहिए। उन्हें निर्णय लेने की स्वतंत्रता, शिक्षा और समान अवसर मिलें—तभी सच्चे अर्थों में सशक्तिकरण संभव है।
आज की लड़की समझ चुकी है कि उसे किसी की छाया बनकर नहीं, बल्कि खुद की रोशनी बनकर जीना है। वह परंपरा और प्रगति के बीच संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ रही है। उसे सहारे की नहीं, अवसर की जरूरत है।
समय आ गया है कि हम लड़कियों को “कमजोर वर्ग” नहीं, “सबसे मजबूत संभावना” के रूप में देखें। क्योंकि जब एक लड़की शिक्षित और आत्मनिर्भर होती है, तो केवल एक जीवन नहीं, पूरा समाज आगे बढ़ता है।
नई सदी की लड़कियों में आत्मविश्वास, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की उड़ान


