भरत चतुर्वेदी
भारत केवल एक भू-राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत केंद्र है। इस परंपरा की धुरी रहे हैं आदि गुरु आदि शंकराचार्य , जिन्होंने अद्वैत वेदांत का संदेश देकर पूरे भारत को सांस्कृतिक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। उनके द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठ—श्रीनगरी शारदा पीठम , द्वारका शारदा पीठ , गोवर्धन मठ पुरी और ज्योतिर्लिंग मठ —आज भी सनातन परंपरा के मार्गदर्शक स्तंभ माने जाते हैं।
ऐसे में यदि किसी शंकराचार्य पर आरोप या मुकदमा दर्ज होता है, तो यह केवल एक व्यक्ति पर कानूनी कार्यवाही का विषय नहीं रह जाता, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
शंकराचार्य का पद केवल प्रशासनिक या धार्मिक उपाधि नहीं है।यह वेद, उपनिषद और शास्त्रों की जीवंत परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।
देश-विदेश में लाखों अनुयायी उन्हें आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानते हैं।
हिंदू समाज के धार्मिक निर्णयों में उनका मत महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत में लगभग 80% आबादी स्वयं को हिंदू मानती है। ऐसे में शंकराचार्य जैसे पद पर आसीन संत पर सार्वजनिक आरोप स्वाभाविक रूप से व्यापक प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं।
जब किसी धार्मिक गुरु पर मुकदमा होता है, तो उनके अनुयायियों में यह भावना उत्पन्न हो सकती है कि:
क्या यह केवल कानूनी प्रक्रिया है या किसी विचारधारा को बदनाम करने का प्रयास?
क्या सनातन परंपरा को कमजोर करने की कोशिश हो रही है?
धर्म और न्याय प्रक्रिया अलग क्षेत्र हैं, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में दोनों का मिश्रण अक्सर भावनात्मक उबाल पैदा करता है।
इतिहास बताता है कि भारतीय समाज में संतों और मठों ने केवल पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक संरक्षण में भी भूमिका निभाई है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
भारत की पहचान “आध्यात्मिक गुरु” के रूप में भी होती है।
हर वर्ष करोड़ों विदेशी पर्यटक काशी, ऋषिकेश, पुरी और द्वारका जैसे तीर्थों में आते हैं।
योग, वेदांत और ध्यान की परंपरा विश्वभर में लोकप्रिय है।
जब किसी शीर्ष धार्मिक पदाधिकारी पर विवाद खड़ा होता है, तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसे केवल कानूनी खबर के रूप में नहीं, बल्कि भारत की धार्मिक संरचना से जोड़कर देखता है। इसलिए यह आवश्यक है कि किसी भी आरोप की जांच निष्पक्ष हो और सार्वजनिक विमर्श संयमित रहे।
सनातन और आत्मसम्मान
सनातन धर्म हजारों वर्षों से आक्रमणों, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और सामाजिक परिवर्तनों के बावजूद जीवित और सशक्त रहा है।
एक व्यक्ति पर आरोप से पूरी परंपरा को कटघरे में खड़ा कर देना उचित नहीं है।यदि आरोप असत्य हैं, तो न्यायिक प्रक्रिया उन्हें स्पष्ट करेगी।
यदि सत्य हैं, तो भी कानून के दायरे में समाधान निकलेगा।
परंतु इस बीच पूरे धर्म या परंपरा को संदेह के घेरे में खड़ा करना सामाजिक समरसता के लिए उचित नहीं।
शंकराचार्य पर लगे आरोपों को लेकर देश में स्वाभाविक रूप से भावनाएं उभरना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि सनातन की गरिमा और न्याय व्यवस्था—दोनों का सम्मान बना रहे।धर्म की रक्षा भावनात्मक उत्तेजना से नहीं, बल्कि धैर्य, तथ्य और सत्य से होती है।
भारत की ताकत उसकी आध्यात्मिक विरासत में है।
यदि हम अपनी परंपरा का सम्मान करते हुए न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा रखें, तो न तो सनातन कमजोर होगा और न ही भारत की वैश्विक छवि।






